लघु उपन्यास – दूसरा खंड
अध्याय – 13 : प्रतीक्षा की ध्वनि
सुबह
धीरे-धीरे
शहर के ऊपर उतर रही थी।
खिड़की से आती रोशनी
कमरे के फर्श पर
एक लंबा आयत बना रही थी।
मैं
नींद से पूरी तरह जागा नहीं था
पर मन
कहीं और था।
रात की वह
छोटी-सी हिम्मत
अब
सुबह की एक लंबी प्रतीक्षा में बदल चुकी थी।
मेज़ पर रखा
मोबाइल
शांत पड़ा था।
उसकी स्क्रीन
काली थी।
और उस काली स्क्रीन में
मुझे
अपना ही चेहरा दिखाई दे रहा था।
मैंने
उसे उठाया।
स्क्रीन जली।
कोई नोटिफिकेशन नहीं।
मैं हल्के से मुस्कुराया।
अचानक
मन के भीतर
एक और विचार उठा—
प्रतीक्षा
दरअसल
मनुष्य की सबसे गहरी आध्यात्मिक अवस्थाओं में से एक है।
ध्यान में
हम क्या करते हैं?
हम भी तो
किसी उत्तर की प्रतीक्षा ही करते हैं।
कभी
मौन की।
कभी
अनुभूति की।
और कभी
उस अज्ञात स्पर्श की
जो भीतर से कहता है—
तुम अकेले नहीं हो।
मैंने
मोबाइल वापस मेज़ पर रख दिया।
रसोई में गया।
चाय बनाई।
केतली से उठती भाप
धीरे-धीरे
खिड़की की रोशनी में
घुल रही थी।
मैंने सोचा—
प्रेम
शायद
यहीं से शुरू होता है।
किसी के साथ होने से पहले
उसके आने की संभावना से।
चाय लेकर
मैं फिर कुर्सी पर बैठ गया।
मेज़ पर
लैपटॉप
अब भी बंद था।
पर मन
बार-बार
मोबाइल की ओर जा रहा था।
मैंने
अपने भीतर उठती उस बेचैनी को
ध्यान से देखा।
यही तो
साक्षी भाव है—
भावों को देखना
पर उनसे बह न जाना।
मैंने
कुछ देर आँखें बंद कर लीं।
साँस भीतर गई।
फिर बाहर आई।
और उसी शांत क्षण में
मुझे लगा—
जैसे भीतर
एक चौथा आयाम खुल रहा हो।
जागरण
स्वप्न
सुषुप्ति
और उनके पार
एक हल्की-सी
शांत अवस्था।
ऋषियों ने शायद
इसी को
तुरीय कहा होगा।
जहाँ
इच्छाएँ पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं
पर
उनकी पकड़ ढीली पड़ जाती है।
उसी अवस्था में
मुझे अचानक हँसी आ गई।
मैंने सोचा—
कितनी अजीब बात है।
एक तरफ
मनुष्य
ब्रह्मांड के रहस्य समझना चाहता है
और दूसरी तरफ
वह
एक Facebook notification का इंतज़ार कर रहा होता है।
जीवन
शायद
इसी विरोधाभास का नाम है।
मैंने
मोबाइल फिर उठाया।
स्क्रीन जली।
इस बार
एक छोटी-सी लाल बिंदी
ऊपर चमक रही थी।
दिल
थोड़ा तेज़ धड़कने लगा।
मैंने
धीरे से
नोटिफिकेशन खोला।
वहाँ लिखा था—
Sakshi accepted your friend request
कुछ क्षण
मैं स्क्रीन को देखता रहा।
कमरे में
सब कुछ
जैसा का तैसा था।
पर भीतर
जैसे
एक छोटी-सी घंटी बज उठी हो।
मैंने
धीरे से मोबाइल मेज़ पर रख दिया।
खिड़की से आती हवा
अब थोड़ी ठंडी हो गई थी।
मैंने सोचा—
प्रेम
शायद
कभी-कभी
इतना ही होता है।
न कोई घोषणा।
न कोई शोर।
बस
किसी दूर बैठे व्यक्ति का
एक छोटा-सा स्वीकार।
और उस स्वीकार में
एक पूरा ब्रह्मांड
धीरे-धीरे
खुलने लगता है।
मैं खिड़की के पास गया।
बाहर
शहर पूरी तरह जाग चुका था।
लोग
अपनी-अपनी दिशाओं में जा रहे थे।
पर मेरे भीतर
एक नई दिशा
अभी-अभी
जन्म ले रही थी।
और मुझे लगा—
कहानी
अब सचमुच
शुरू हुई है।
No comments:
Post a Comment