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Friday, 13 March 2026

अध्याय – 15 : पहला संदेश

 लघु उपन्यास – दूसरा खंड

अध्याय – 15 : पहला संदेश


दोपहर

धीरे-धीरे

कमरे में उतर रही थी।


खिड़की से आती धूप

अब मेज़ के एक कोने पर टिक गई थी।


कमरे में

एक हल्की-सी गर्मी भरने लगी थी।


मैं

कुर्सी पर बैठा

कुछ लिखने की कोशिश कर रहा था।


काग़ज़ सामने था

कलम हाथ में थी

पर शब्द

जैसे कहीं और भटक रहे थे।


ऐसा नहीं था कि मन पूरी तरह बेचैन था।


पर भीतर

एक हल्की-सी प्रतीक्षा

अब भी थी।


कभी-कभी

मन

अनजाने में

मोबाइल की ओर चला जाता।


फिर

मैं खुद ही मुस्कुरा देता।


यही तो

मन की पुरानी आदत है—


जो चीज़

थोड़ी-सी खुशी दे सकती है

उसे बार-बार देखना।


तभी

गली से

एक आवाज़ आई—


“भैया… दूध का बर्तन बाहर रख दीजिए।”


दूधवाला

शायद आज थोड़ा देर से आया था।


मैंने

दरवाज़ा खोला।


बर्तन आगे बढ़ाया।


वह

दूध डालते हुए बोला—


“आज बहुत गर्मी है।”


मैंने सिर हिलाया।


जीवन की

सबसे सच्ची बातचीतें

अक्सर

इन्हीं छोटे वाक्यों में होती हैं।


वह चला गया।


मैं वापस कमरे में आया।


मेज़ पर बैठा।


माण्डूक्य उपनिषद

अब भी वहीं पड़ा था।


मैंने

उसका एक पन्ना फिर खोला।


वहाँ लिखा था—


जाग्रत में

हम संसार देखते हैं।


स्वप्न में

हम अपने भीतर का संसार देखते हैं।


सुषुप्ति में

दोनों शांत हो जाते हैं।


और तुरीय—


वह

जो इन तीनों को देखता है।


मैंने

कुछ क्षण

उस वाक्य को पढ़ा।


और अचानक

मुझे लगा—


आजकल

मेरा मन

जाग्रत और स्वप्न के बीच

कहीं चल रहा है।


जाग्रत में

मैं इस कमरे में हूँ।


इस मेज़ पर।


इन किताबों के बीच।


और स्वप्न में—


कभी-कभी

उसकी मुस्कान

अचानक सामने आ जाती है।


मैं

यही सोच रहा था


कि तभी


मेज़ पर रखा

मोबाइल

हल्का-सा चमका।


एक छोटी-सी ध्वनि हुई।


मैंने

धीरे से

स्क्रीन की ओर देखा।


एक नया नोटिफिकेशन था।


Message from Sakshi


दिल

एक क्षण के लिए

थोड़ा तेज़ धड़कने लगा।


मैंने

मोबाइल उठाया।


संदेश खोला।


वहाँ

सिर्फ़ एक पंक्ति लिखी थी—


“आप शायद वही हैं

जो कॉलेज की लाइब्रेरी में

हमेशा खिड़की के पास बैठते थे?”


मैं

कुछ क्षण

स्क्रीन को देखता रहा।


एक हल्की-सी हँसी

अपने-आप

चेहरे पर आ गई।


इतने सालों बाद

किसी ने

मुझे

मेरी एक पुरानी आदत से पहचान लिया था।


मैंने

खिड़की की ओर देखा।


सचमुच

मैं आज भी

खिड़की के पास ही बैठा था।


शायद

मनुष्य

इतना भी नहीं बदलता।


मैंने

धीरे-धीरे

संदेश टाइप करना शुरू किया।


“हाँ

शायद वही हूँ।


और आप

शायद वही हैं

जो लाइब्रेरी की सीढ़ियों पर

दोस्तों के साथ बहुत हँसती थीं।”


कुछ क्षण

मैंने संदेश को देखा।


फिर

भेज दिया।


कमरे में

फिर वही शांति लौट आई।


पर अब

उस शांति में

एक नई लहर थी।


मैंने

कुर्सी से उठकर

खिड़की के बाहर देखा।


गली में

एक बच्चा

साइकिल चलाना सीख रहा था।


उसके पिता

पीछे से सीट पकड़े हुए थे।


बच्चा

डर भी रहा था

और खुश भी था।


मुझे लगा—


शायद प्रेम भी

कुछ ऐसा ही होता है।


हम

थोड़ा डरते हुए

थोड़ा मुस्कुराते हुए

उसकी ओर बढ़ते हैं।


और धीरे-धीरे

एक दिन

हमें पता चलता है—


हम

चलना सीख चुके हैं।


मैं

फिर कुर्सी पर बैठ गया।


माण्डूक्य उपनिषद

अब भी खुला था।


मैंने

धीरे से सोचा—


शायद

जीवन का सबसे सुंदर संतुलन

यही है—


एक तरफ

आत्मा की शांति


और दूसरी तरफ

किसी के साथ

शब्दों का एक छोटा-सा संवाद।


दोनों के बीच

अगर साक्षी भाव बना रहे


तो शायद


प्रेम भी

एक ध्यान बन सकता है।


मोबाइल

फिर मेज़ पर शांत पड़ा था।


पर इस बार

मुझे पता था—


कहानी अब

धीरे-धीरे

अपने सबसे रोचक मोड़ की ओर

बढ़ रही है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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