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Friday, 13 March 2026

अध्याय – 14 : एक साधारण सुबह

 लघु उपन्यास – दूसरा खंड

अध्याय – 14 : एक साधारण सुबह


सुबह

अब पूरी तरह

शहर में उतर चुकी थी।


खिड़की के बाहर

गली में

हलचल शुरू हो गई थी।


दूधवाले की साइकिल

धीरे-धीरे

गली में आ रही थी।


उसकी घंटी

हर घर के सामने

एक ही तरह से बजती—


ट्रिन… ट्रिन…


जैसे

वह सिर्फ़ दूध नहीं

सुबह भी बाँट रहा हो।


मैं

खिड़की के पास खड़ा

उसे देख रहा था।


सामने वाले घर की

बूढ़ी अम्मा

दरवाज़ा खोलकर

स्टील का बर्तन

आगे बढ़ा रही थीं।


दूध

पतली धार में

बर्तन में गिर रहा था।


जीवन

अक्सर

इन्हीं छोटी-छोटी ध्वनियों से बना होता है।


मैं

धीरे से मुस्कुराया।


फिर

मेज़ पर रखे मोबाइल की ओर देखा।


स्क्रीन

अब शांत थी।


पर उसके भीतर

एक छोटा-सा बदलाव

रात में हो चुका था।


अब

वह

मेरी मित्र सूची में थी।


यह विचार

मन में आया

और उतनी ही जल्दी

चला भी गया।


क्योंकि

ठीक उसी समय

दरवाज़े पर

हल्की-सी दस्तक हुई।


“भैया…”


मकान मालिक का बेटा था।


“पापा ने कहा है

किराया शाम तक दे दीजिएगा।”


मैंने

हल्की-सी हँसी के साथ

सिर हिला दिया।


जीवन

कभी-कभी

बड़ी सहजता से

हमें ज़मीन पर लौटा लाता है।


अभी

मन

प्रेम और प्रतीक्षा में था


और अगले ही क्षण

वह

किराए और खर्चों में आ जाता है।


लड़का चला गया।


कमरे में

फिर वही शांति लौट आई।


मैं

कुर्सी पर बैठ गया।


मेज़ पर

किताबें बिखरी थीं।


उनमें से

एक पतली-सी पुस्तक

अलग दिखाई दे रही थी।


माण्डूक्य उपनिषद।


मैंने

उसे उठाया।


पन्ना खोला।


पहली ही पंक्ति

जैसे

सीधे मन में उतर गई—


“ओंकार ही सम्पूर्ण ब्रह्म है।”


मैंने

धीरे-धीरे पढ़ना शुरू किया।


माण्डूक्य

बहुत छोटा उपनिषद है।


पर उसके भीतर

एक अद्भुत रहस्य छुपा है।


वह कहता है—


मानव चेतना की

चार अवस्थाएँ होती हैं।


जाग्रत

जहाँ हम दुनिया को देखते हैं।


स्वप्न

जहाँ हम अपने भीतर की दुनिया में रहते हैं।


सुषुप्ति

जहाँ सब कुछ शांत हो जाता है।


और फिर—


तुरीय।


जो

इन तीनों से परे है।


न पूरी तरह जाग्रत

न स्वप्न

न सुषुप्ति।


बस

एक शुद्ध साक्षी।


मैंने

कुछ क्षण

पुस्तक बंद कर दी।


और सोचा—


क्या प्रेम भी

कुछ ऐसा ही नहीं है?


पहले

हम किसी को

जाग्रत अवस्था में देखते हैं।


फिर

वह

स्वप्नों में आने लगता है।


फिर

कभी-कभी

वह

मन की गहरी शांति में उतर जाता है।


और शायद

कभी-कभी


प्रेम

तुरीय की तरह भी होता है।


जहाँ

न पाने की चिंता होती है

न खोने का भय।


सिर्फ़

एक शांत उपस्थिति।


मैंने

मोबाइल उठाया।


स्क्रीन खोली।


उसका नाम

अब भी

वहीं था।


कुछ क्षण

मैंने

उस प्रोफ़ाइल को देखा।


उसकी नई तस्वीर

शायद

हाल ही में डाली गई थी।


पृष्ठभूमि में

एक पेड़ था।


और वह

हल्की मुस्कान के साथ

कैमरे की ओर देख रही थी।


मैंने सोचा—


जीवन

कितना अजीब है।


एक तरफ

गली में दूधवाला है

मकान मालिक है

किराया है

रसोई का खर्च है।


और दूसरी तरफ


किसी दूर बैठे व्यक्ति की

एक मुस्कान


मन में

इतनी हलचल पैदा कर सकती है।


मैंने

धीरे से मोबाइल मेज़ पर रख दिया।


कमरे में

हल्की हवा

अब भी चल रही थी।


मेज़ पर

माण्डूक्य उपनिषद

अब भी खुला पड़ा था।


और उस खुली किताब को देखकर

मुझे लगा—


शायद

जीवन का रहस्य


बहुत दूर नहीं है।


वह

इन्हीं तीन चीज़ों के बीच कहीं छिपा है—


एक छोटा-सा कमरा

एक साधारण सुबह

और


किसी के प्रति

मन में उठती

एक शांत

निर्मल भावना।


मैंने

खिड़की के बाहर देखा।


दूधवाला

अब गली के अंत तक पहुँच चुका था।


और मुझे लगा


कहानी

धीरे-धीरे


अब

अपने असली अर्थ की ओर

बढ़ रही है।


मुकेश ---------------

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