लघु उपन्यास
भाग – 16 : गुमटी और चाय का तालाब (सात्र की दृष्टि)
संध्या के हल्के धुंधले उजाले में
मैंने सिगरेट का आखिरी कश लिया
और गुमटी की तरफ बढ़ा।
सात्र मेरे साथ थे,
लेकिन उनकी मौन उपस्थिति
जैसे हर कदम पर मेरे साथ घुली हुई थी।
गुमटी के पास
चाय की भाप उठ रही थी।
तालाब के पानी में
धूप की आखिरी किरणें
धीरे-धीरे पानी की सतह पर फैल रही थीं।
सात्र खड़े थे,
तालाब को घूरते हुए नहीं,
बल्कि देखते हुए—
हर पानी की लहर में,
हर बूँद में,
हर पत्थर और पत्ते में जीवन खोजते हुए।
गुमटी वाले ने मुझे पहचाना,
चाय बनाई और हाथ में दी।
मैंने चुस्की ली।
सात्र भी धीरे-धीरे तालाब के किनारे आए।
उनकी दृष्टि
साधारण दृश्य को भी
असाधारण बना रही थी।
तालाब के पानी में तैरती मछलियाँ
उनकी नजर में केवल मछलियाँ नहीं थीं;
वे छोटे-छोटे अनुभवों के प्रतीक थे।
सात्र ने कहा—
(बिना शब्दों के, उनकी मौन उपस्थिति ही बताती थी)
“देखो कैसे जीवन
छोटे-छोटे क्षणों में बिखरा है।
हर लहर
हर छाया
हर परावर्तन
अपने आप में पूर्ण है।”
गुमटी वाले की चाय
मेरे हाथ में गर्म थी,
लेकिन मेरी आँखें
सात्र के दर्शन पर टिक गई थीं।
वे केवल देख रहे थे,
लेकिन देखते हुए
हर चीज़ को समझ रहे थे।
मैंने तालाब के पानी की सतह पर
अपना प्रतिबिंब देखा।
सात्र ने मुझे देखा,
लेकिन उनकी दृष्टि
सिर्फ़ मेरी नहीं थी।
वह हर उस अनुभव पर थी
जो मैंने रोज़मर्रा में अनुभव किया—
चाय की भाप,
सिगरेट का धुआँ,
तालाब में हल्की लहर,
गुमटी वाला अपनी हँसी में।
और फिर,
सत्र की निगाह ने मुझे यह भी दिखाया—
कि ये सब छोटी-छोटी चीज़ें
हमारे भीतर की बड़ी कहानियों का हिस्सा हैं।
मैंने एक और चुस्की चाय की ली,
सिगरेट को जलाया,
धुआँ आसमान की तरफ़ उड़ गया।
सात्र ने तालाब के पानी में
अपने हाथ धीरे-धीरे डाले
और पानी की हल्की सी ठंडक
अपने भीतर समेट ली।
मैंने महसूस किया—
सात्र केवल देख नहीं रहे थे,
वे हमें
हमारी छोटी-छोटी दुनिया के दर्शन करा रहे थे।
और मैंने तय किया—
हर रोज़,
हर क्षण,
हर वस्तु में कुछ नया देखने का अभ्यास करूंगा।
सात्र की उपस्थिति
मुझे यह सिखा रही थी।
गुमटी से चाय का मग उठाया,
सिगरेट का धुआँ छोड़ते हुए
मैं धीरे-धीरे घर की ओर लौट गया।
सात्र मेरे पीछे थे,
लेकिन उनका दर्शन
कमरे के हर कोने में
हमेशा मेरे साथ रहेगा।
— मुकेश
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