लघु उपन्यास
भाग – 15 : सात्र और सुबह की चाय (दर्शन सहित)
रात काफ्का पढ़ते-पढ़ते
न जाने क्या-क्या सोचते
नींद लग गई थी।
सुबह आँख खुली तो
सीधे छत दिखी।
कुछ पापड़ियाँ गिर चुकी थीं,
कुछ गिरने के लिए तैयार थीं।
पंखे की पंखुड़ियाँ
साफ़ होने की अर्जी लिए
चुपचाप लटकी थीं।
सिर्फ कभी-कभी
किसी चिड़िया के
कुछ देर बैठ जाने पर ही
हरकत में आती हैं।
वर्ना
जाड़े भर बंद रहती हैं।
कई बार सोचा
घर की मरम्मत के लिए
मकान मालिक से बोलूँ,
पर किस मुँह से बोलूँ?
बकाया किराया
सामने मुँह खोल के खड़ा हो जाता है।
मैंने देखा—
बाथरूम का दरवाज़ा भी
नीचे से सड़ चुका है।
कब्जे उखड़ रहे हैं।
चूँकि सिर्फ़
मैं ही इस्तेमाल करने वाला हूँ,
लिहाज़ा कोई बहुत टेंशन नहीं है।
उस दिन सलोनी आयी थी,
तो मुँह बिचका के रह गई थी।
खैर,
मैंने मन ही मन
पंखे, दीवारों और छत से माफी माँगी,
नज़रें चुराई,
और सिगरेट की डिब्बी की तरफ हाथ बढ़ाया।
सिरहाने
काफ्का की किताब के नीचे
सात्र झाँक रहे थे।
मैंने उनसे कहा—
“रुको, आज दिन तुम्हारा ही है।
तुम्हारी बातें
मैं बाद में सुनूँगा।”
सात्र
धीरे-धीरे कमरे में
हर चीज़ पर नज़र डाल रहे थे।
उनकी उपस्थिति
सिर्फ देखने की नहीं थी।
वे दर्शन से देख रहे थे—
हर चीज़ के भीतर का अर्थ,
हर धूल के कण की गहराई,
हर दिन की नीरसता में
छिपी हुई ज़िंदगी।
वे मुझे यह बताना चाहते थे कि—
“हर चीज़ का अस्तित्व केवल भौतिक नहीं।
हर वस्तु का अपना अनुभव है,
अपना स्वर है,
अपनी कहानी है।”
झाड़ू ने हल्की सी सरक कर
स्ट्रोक लिया।
चलनी ने
आटे की बूंदों को देखकर मुस्कुराया।
सिगरेट का धुआँ
कमरे में घूमते हुए
सात्र के चारों ओर लहराता।
सात्र
हर बर्तन, हर झाड़ू, हर पंखे में
छुपे जीवन को महसूस कर रहे थे।
वे समझ रहे थे कि
कैसे छोटी-छोटी चीज़ें
हमारे रोज़मर्रा के अनुभवों में
सहभागी बन जाती हैं।
उनकी निगाह
पंखे से टकराई।
फिर बर्तन पर गई।
चलनी को देखकर
वे धीरे-से हँसे।
उनकी हँसी
जैसे
कमरे के कोनों में गूंज रही हो।
स्ट्रोव पर रखी परात
आटे की खुशबू
सात्र के चारों ओर फैल गई।
मैंने देखा—
वे केवल देख नहीं रहे,
वे समझ रहे हैं।
हर बर्तन, हर झाड़ू, हर पंखा
उनकी दृष्टि में
जैसे जीवित हो गया।
धुआँ
सात्र के चारों ओर मंडराया,
और कमरे में
एक हल्की धुंध-सी फैल गई।
मैंने सोचा—
वे केवल चीज़ों की मरम्मत नहीं देख रहे,
वे जीवन की मरम्मत देख रहे हैं।
हर टूट-फूट, हर धूल
उनके दर्शन में
अपनी जगह बना रही थी।
खिड़की से आती हवा
सात्र की उपस्थिति को
और नर्म कर रही थी।
मैंने सिगरेट का आखिरी कश लिया,
और अपने आप से कहा—
“आज शाम, चाय की तालाब के लिए
गुमटी की तरफ रुख करना होगा।
सात्र को सोचते हुए।
उनकी मौन उपस्थिति में
कमरे की हर चीज़ ने
थोड़ी मुस्कान दी होगी।”
— मुकेश
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