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Tuesday, 10 March 2026

भाग – 14 : काफ्का और सिगरेट का धुआँ

 लघु उपन्यास

भाग – 14 : काफ्का और सिगरेट का धुआँ


रोटी और सब्ज़ी खा लेने के बाद

कमरे में बैठा,

सिगरेट की डिब्बी खोली।


एक कश लिया

धुआँ उठता हुआ

खिड़की के बाहर उड़ गया।


धुआँ, जैसे

कमरे की सारी चीज़ों से बातें कर रहा हो।


मेरे सामने

काफ्का की किताब रखी है।

“परिवर्तन (The Metamorphosis)”

वह कहानी जो हर बार पढ़ने पर

नई तरह से दिखती है।


मैं सोचने लगा—


काफ्का के दर्शन क्या कहते हैं?


एक आदमी

एक दिन उठता है

और पाता है कि वह

एक कीट में बदल गया है।


इस रूपांतरण में

मनुष्य का अकेलापन

और समाज से उसका संघर्ष

भी छिपा हुआ है।


सिगरेट का धुआँ

मेरे हाथ से उठता है

और

किताब के पन्नों के बीच

घुलता जाता है।


काफ्का लिखता है

व्यक्तित्व और पहचान

समाज के नियमों और अपेक्षाओं के बीच

कितनी जल्दी बदल सकती है।


मैंने दूसरा कश लिया।


रूम का हर कोना

शांत है।

केवल

धुआँ और किताब की हल्की गंध है।


काफ्का की कहानी

जैसे मेरे कमरे की चीज़ों से

बात कर रही हो


“तुम्हारे कमरे में रखी हर चीज़

भी कभी-कभी

अपनी पहचान बदलती है।

एक झाड़ू, एक चलनी,

एक वाशिंग मशीन…

वे भी तुम्हारे होने से

अपने अर्थ बदलती हैं।”


मैंने तीसरा कश लिया।


धुआँ

सफेद-सा,

धीरे-धीरे

छत की ओर बढ़ा।


काफ्का की किताब

मेरे सामने

जैसे धीरे-धीरे जीवित हो रही थी।


“परिवर्तन” में

कितना गहरा दर्द है

कितना अकेलापन।


और कितनी ही बारीकियाँ

जो आंखों से नहीं दिखती,

केवल महसूस की जा सकती हैं।


मैंने सोचा


मेरे कमरे में

जो चीज़ें मुझे हर दिन याद दिलाती हैं,

जैसे झाड़ू, बर्तन, चलनी, आटा…

वे भी

काफ्का के उस आदमी की तरह हैं।


जो बदल जाता है,

फिर भी वही रहता है।


सिगरेट का एक और कश लिया।


धुआँ

कमरे में फैलता गया।


काफ्का की किताब

मेरे हाथों में थी,

और मुझे लगा—


हर पन्ना

जैसे

मेरे कमरे की बात कर रहा हो।


“तुम्हारी चीज़ें भी

थोड़ी-सी डरती हैं,

थोड़ी-सी उम्मीद करती हैं,

थोड़ी-सी बदलती हैं।


लेकिन तुम उनके साथ रहते हो,

जैसे मैं अपने आदमी के साथ हूँ।”


मैंने किताब बंद की।


सिगरेट की आखिरी राख

अशांत रूप से

सिगरेट के मुँह से गिर गई।


और मैंने महसूस किया—

काफ्का पढ़ना

सिर्फ़ कहानी नहीं है।


यह एक दर्शन है,

जो हर रोज़

कमरे की चीज़ों,

और मेरे अकेलेपन के

साथ जुड़ जाता है।


मैंने खिड़की खोली,

धुआँ बाहर निकल गया।


और मुझे लगा


आज रात

कमरे में हर चीज़

थोड़ी शांत

थोड़ी मुस्कुराती हुई

मुझसे बातें कर रही है।


— मुकेश


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