लघु उपन्यास – दूसरा खंड
अध्याय – 16 : एक साधारण प्रश्न
दोपहर
धीरे-धीरे
कमरे में उतर रही थी।
खिड़की से आती धूप
अब मेज़ के आधे हिस्से पर फैल गई थी।
किताबों के किनारे
हल्की सुनहरी रेखाओं की तरह चमक रहे थे।
कमरा
हमेशा की तरह
शांत था।
कभी-कभी
मुझे लगता था
यह कमरा भी
मेरी तरह
बात कम करता है।
मैं
कुर्सी पर बैठा
एक किताब के पन्ने पलट रहा था।
मेज़ पर
किताबों का वही छोटा-सा संसार था
कुछ उपनिषद
कुछ डायरी
कुछ अधूरी पांडुलिपियाँ।
उसी समय
मोबाइल की स्क्रीन
हल्के से चमकी।
मैंने
धीरे से उसे उठाया।
संदेश था।
साक्षी का।
कुछ क्षण
मैंने स्क्रीन को देखा
जैसे शब्दों को पढ़ने से पहले
उनकी धड़कन सुनना चाहता हूँ।
संदेश छोटा था
“आप आजकल करते क्या हैं?”
बस
इतना ही।
पर
कभी-कभी
सबसे साधारण प्रश्न
सबसे गहरे उत्तर माँग लेते हैं।
मैंने
मोबाइल मेज़ पर रख दिया।
खिड़की के पास गया।
गली में
दूधवाला अपनी साइकिल
धीरे-धीरे आगे बढ़ा रहा था।
उसकी घंटी
फिर एक बार बजी
ट्रिन… ट्रिन…
जीवन
कभी-कभी
इतना साधारण होता है
कि हम
उसकी सुंदरता देख ही नहीं पाते।
मैं वापस
कुर्सी पर बैठ गया।
कुछ क्षण
सोचा।
फिर
मोबाइल उठाया।
उत्तर लिखने लगा
“कुछ खास नहीं।
पढ़ता हूँ…
थोड़ा लिखता हूँ…
और लोगों की कहानियाँ समझने की कोशिश करता हूँ।”
मैंने
संदेश पढ़ा।
फिर
भेज दिया।
कुछ देर तक
कोई उत्तर नहीं आया।
मैंने
माण्डूक्य उपनिषद का पन्ना खोला।
वहाँ लिखा था
मनुष्य
सिर्फ़ अपने काम से नहीं
अपनी चेतना से पहचाना जाता है।
मैं
उस वाक्य को
धीरे-धीरे पढ़ता रहा।
तभी
मोबाइल फिर चमका।
साक्षी का उत्तर था
“तो आप अभी भी लिखते हैं?”
मैं
हल्के से मुस्कुराया।
शायद
कुछ चीज़ें
लोग बहुत जल्दी पहचान लेते हैं।
मैंने लिखा
“हाँ
शायद लिखना
मेरी आदत है।”
कुछ क्षण बाद
उसका अगला संदेश आया
“और आपका नाम…
अगर मुझे ठीक याद है
तो…”
मैं
स्क्रीन को देखता रहा।
संदेश अधूरा था।
फिर
अगली पंक्ति आई—
“अस्तित्व था न?”
मैं
कुछ देर तक
मोबाइल हाथ में लिए बैठा रहा।
खिड़की से आती हवा
धीरे-धीरे
काग़ज़ों को हिला रही थी।
कमरे में
एक हल्की-सी मुस्कान फैल गई।
इतने वर्षों बाद
किसी ने
मेरा नाम
इतनी सहजता से याद किया था।
मैंने
उत्तर लिखा
“हाँ
अस्तित्व ही हूँ।”
संदेश भेज दिया।
कमरे में
फिर वही शांति लौट आई।
मैंने
धीरे से सोचा
अजीब बात है।
मनुष्य
पूरी उम्र
अपने अस्तित्व को समझने की कोशिश करता है।
और कभी-कभी
कोई दूसरा व्यक्ति
उसे
एक शब्द में पहचान लेता है।
खिड़की के बाहर
शाम उतरने लगी थी।
गली में
बच्चे खेल रहे थे।
दूर कहीं
चाय वाले की आवाज़ आ रही थी।
मैंने
मोबाइल मेज़ पर रखा।
और उसी क्षण
मुझे लगा
कहानी
अब सिर्फ़ एक संवाद नहीं रही।
यह
धीरे-धीरे
दो चेतनाओं के बीच
खुलने वाली यात्रा बन रही है।
और शायद
साक्षी
सिर्फ़ एक नाम नहीं है।
क्योंकि
साक्षी
अंततः
अस्तित्व के प्रति ही हो सकती है।
मैं
कुछ देर
खिड़की के पास खड़ा रहा।
शाम की हवा
धीरे-धीरे कमरे में भर रही थी।
और मुझे लगा
कहानी का अगला अध्याय
शायद
अब
सिर्फ़ स्मृति का नहीं
मुलाक़ात की संभावना का होगा।
मुकेश ,,,,
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