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Friday, 13 March 2026

अध्याय – 17 : स्मृति का एक दरवाज़ा

 लघु उपन्यास – दूसरा खंड

अध्याय – 17 : स्मृति का एक दरवाज़ा


शाम

धीरे-धीरे

गली में उतर रही थी।


दिन की धूप

अब दीवारों से उतरकर

कहीं और जा चुकी थी।


कमरे में

एक हल्की धुंधलकी रोशनी रह गई थी।


मैंने

मेज़ पर रखा छोटा-सा लैम्प जला दिया।


पीली रोशनी

किताबों पर फैल गई।


मोबाइल

अब भी मेज़ पर रखा था।


कुछ देर पहले

साक्षी का संदेश आया था—


“अस्तित्व…”


मैंने

वह शब्द फिर पढ़ा।


कभी-कभी

किसी का

हमारा नाम लेना भी

एक तरह की स्मृति का द्वार खोल देता है।


और सचमुच

उस क्षण

मेरे भीतर

एक पुराना दृश्य धीरे-धीरे जागने लगा।


कॉलेज की लाइब्रेरी।


लंबा-सा हॉल।


ऊँची खिड़कियाँ।


और खिड़की के पास

एक लकड़ी की मेज़।


वही मेज़

जहाँ मैं

अक्सर बैठा करता था।


किताब सामने होती थी

पर मन

कई बार शब्दों से दूर चला जाता था।


उसी समय

लाइब्रेरी के बाहर की सीढ़ियों पर

हँसी की एक आवाज़ आती थी।


हल्की

पर साफ़।


वही हँसी

जिसे सुनकर

कई बार मैं

अनायास खिड़की की ओर देखता था।


वहाँ

कुछ लड़कियाँ खड़ी होती थीं।


और उनके बीच

एक चेहरा


जो

बाकियों से अलग

शांत दिखाई देता था।


शायद वही

साक्षी थी।


मैं

उस समय

कभी उनसे मिला नहीं।


न कोई परिचय हुआ।


बस

कभी-कभी

नज़रें मिलीं।


और फिर

दोनों अपनी-अपनी दुनिया में लौट गए।


जीवन

अक्सर

इसी तरह आगे बढ़ जाता है।


हम सोचते हैं

कुछ हुआ ही नहीं।


पर कहीं

भीतर


एक हल्की-सी रेखा

फिर भी खिंच जाती है।


मैं

इन्हीं विचारों में था


कि तभी


मोबाइल

फिर चमका।


साक्षी का नया संदेश था।


“आपको याद है

लाइब्रेरी की वह खिड़की?”


मैं

कुछ क्षण

स्क्रीन को देखता रहा।


जैसे

किसी ने

मेरे मन की स्मृति पढ़ ली हो।


मैंने

धीरे-धीरे लिखा


“हाँ

वही खिड़की

जहाँ से पेड़ दिखाई देता था।”


कुछ क्षण बाद

उसका उत्तर आया—


“और बारिश में

उस पेड़ की पत्तियाँ

बहुत सुंदर लगती थीं।”


मैं

अनायास मुस्कुरा दिया।


इतने वर्षों बाद भी

हम दोनों की स्मृति

उसी दृश्य पर जाकर ठहर गई थी।


मैंने

खिड़की के बाहर देखा।


यहाँ भी

एक पेड़ था।


उसकी शाखाएँ

हवा में हिल रही थीं।


मैंने सोचा


स्मृतियाँ

शायद पेड़ों की तरह होती हैं।


वे

एक ही जगह खड़ी रहती हैं


पर समय

उनके चारों ओर

घूमता रहता है।


मोबाइल फिर चमका।


साक्षी ने लिखा


“अजीब बात है

न?”


“हमने कभी

ढंग से बात भी नहीं की थी।”


“फिर भी

मुझे लगता था

आप हमेशा

कुछ सोचते रहते थे।”


मैं

कुछ क्षण

उस वाक्य को पढ़ता रहा।


फिर लिखा


“शायद

मैं सचमुच

सोचता रहता था।”


“और शायद

आप

हमेशा हँसती रहती थीं।”


कुछ क्षण

कोई उत्तर नहीं आया।


कमरे में

सिर्फ़ घड़ी की टिक-टिक थी।


और बाहर

शाम की हवा।


मैंने

माण्डूक्य उपनिषद का पन्ना फिर खोला।


वहाँ लिखा था


जो देखता है

और जो देखा जाता है

उनके बीच

एक तीसरा भी होता है।


साक्षी।


मैंने

धीरे से आँखें बंद कर लीं।


और अचानक

मुझे लगा


कहानी

अब

सिर्फ़ स्मृति नहीं रही।


वह

धीरे-धीरे

वर्तमान में उतर रही है।


मोबाइल

फिर चमका।


साक्षी का संदेश था


“अस्तित्व…”


“अगर आप बुरा न मानें

तो एक बात पूछूँ?”


मैंने

स्क्रीन को देखा।


और उस क्षण

मुझे लगा


कहानी का

एक नया दरवाज़ा


अब खुलने वाला है।


मैंने

उत्तर लिखा


“पूछिए।”


कमरे में

फिर वही शांति फैल गई।


पर इस बार

उस शांति में


एक हल्की-सी

संभावना थी


मुकेश ,,,,,,,,,,

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