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Tuesday, 10 March 2026

भाग – 18 : निर्जीव वस्तुओं की कहानियाँ और सात्र–सायमन का संग

 लघु उपन्यास

भाग – 18 : निर्जीव वस्तुओं की कहानियाँ और सात्र–सायमन का संग

रात के सन्नाटे में
मैंने चाय की आखिरी घूँट ली
और सिगरेट का धुआँ धीरे-धीरे हवा में मिल रहा था।

कमरे की हर चीज़
मौन होकर,
लेकिन गहरी दृष्टि से मुझसे बातें करने लगी।

तखत ने धीरे-से कहा—
“याद है, कितने वर्षों से तुमने हमें संभाला है?
हमारे ऊपर सोते हुए,
तुम्हारी नींद की गर्माहट थी,
और तुम्हारे सपनों की हल्की-हल्की कंपनियाँ।”

झाड़ू ने फुसफुसाया—
“याद है वह दिन, जब पालतू बिल्ली तुम्हारे बिस्तर के पास सो रही थी,
और तुमने उसे उठाने के बजाय
उसकी नींद का सम्मान किया?”

किताबों की अलमारी ने भी अपनी आवाज़ दी—
“तुम्हारी पढ़ाई, तुम्हारे रात्रि जागरण,
सात्र और सायमन दा बौआ की बातें,
हम सबने देखा है।
हर पन्ने में तुम्हारी सोच के निशान हैं,
हर शब्द में तुम्हारा समय लिखा है।”

सिगरेट की डिब्बी ने हल्की खड़खड़ाहट से कहा—
“तुमने कितनी बार हमको हाथ लगाया,
धुआँ छोड़ा, और फिर सत्र के दर्शन में खो गए।
सत्र और सायमन—
दोनों की यादें अक्सर तुम्हारे विचारों में मिल जाती हैं,
जैसे दो अलग दिशाएँ एक ही मार्ग पर मिल जाएँ।”

और मैं महसूस करने लगा—
कि घर के कोने-कोने में रखी हर वस्तु,
हर निर्जीव चीज़,
सिर्फ़ वस्तु नहीं है।
वे साक्षी हैं,
हमारी स्मृतियों, हमारी सोच, और हमारी भावनाओं के।

सत्र खड़े थे,
उनकी निगाहें गहरी और स्थिर।
साइमन दा बौआ की यादें
उनके विचारों की तरह मेरे भीतर चल रही थीं।
दोनों की उपस्थिति
सिर्फ़ अतीत की स्मृति नहीं थी,
बल्कि वर्तमान में दर्शन के नए आयाम खोल रही थी।

मुझे याद आया—
कितनी बार सत्र और सायमन के साथ बैठकर
हमने जीवन के छोटे-छोटे रहस्यों पर चर्चा की थी।
उनकी बातों में हमेशा यही संदेश था—
“हर जीवित और निर्जीव चीज़ में दर्शन है,
हर स्मृति में सीख है,
और हर क्षण में एक कहानी।”

मैंने खिड़की की तरफ देखा।
पंखे पर बैठी चिड़िया
मौन होकर मेरे विचारों में समा रही थी।
तालाब के पानी की सतह पर
हवा के हल्के झोंके
धूप की बूँदों से खेल रहे थे।

और तभी, कमरे की सबसे पुरानी वस्तु—
माँ के हाथ से बनी एक छोटी कटोरी—
धीरे से बोली—

“याद है, कितनी बार तुमने हम पर हाथ रखा,
और फिर अपनी सोच में खो गए।
हम केवल उपयोग के लिए नहीं हैं,
हम तुम्हारे जीवन की कहानी में
एक धरोहर हैं।”

मैंने सिगरेट का एक कश लिया।
धुआँ ऊपर उठता रहा।
सत्र ने देखा,
साइमन की यादें मेरे भीतर हल्की-हल्की गूँज रही थीं।

और अंत में,
एक सूफ़ियाना शेर,
जिसका स्वर कमरे के हर कोने में गूंजा—

“जो अपने चारों ओर की हर चीज़ में जीवन देख ले,
वही सच में अपने भीतर की गहराई को पहचानता है;
निर्जीव भी, जीवित भी, स्मृति भी, दर्शन भी—
सब एक ही नदी के बहाव में मिलकर जीवन का संगीत रचते हैं।”

कमरा मौन हो गया।
सत्र खड़े थे।
साइमन दा बौआ की यादें धीरे-धीरे
सिरहाने के पास पंख फैलाती नींद में खो गईं।
और मैं,
सिगरेट की डिब्बी हाथ में लिए,
धुएँ के बीच
घर की हर चीज़ में जीवन और स्मृति को महसूस करते हुए
धीरे-धीरे अपनी कुर्सी पर बैठा।

— मुकेश

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