लघु उपन्यास
भाग – 17 : घर के जीव, वस्तुएँ और सात्र के दर्शन
संध्या की हल्की रोशनी
खिड़की से कमरे में धीरे-धीरे उतर रही थी।
सिगरेट का धुआँ अभी भी हवा में नाच रहा था,
लेकिन आज कमरे की हर चीज़
कुछ अलग महसूस कर रही थी।
छोटे-छोटे चूहे
कोने में चुपचाप घूम रहे थे।
लेकिन उनकी चाल
सात्र की दृष्टि में
सिर्फ़ घुमना नहीं थी,
बल्कि अनदेखी मेहनत और जीवन की सादगी थी।
रौशनदान के कबूतर
धीरे-धीरे पंख फड़फड़ा रहे थे।
उनकी खिड़की में बैठी हल्की ठंडी हवा
सात्र की निगाह में
सृजन और निर्जनता का संवाद थी।
मकड़ी
अपनी जाली में बैठी थी।
उसके धागों की हर नोक
सात्र की दृष्टि में
सिर्फ़ जाल नहीं,
पर धैर्य और सृजन की प्रतीक बन गए थे।
काकरोच
धीरे-धीरे दीवार पर चढ़ता था।
सात्र के दर्शन में
उसकी हर चाल
सिर्फ़ जीवित रहने का संघर्ष नहीं,
बल्कि जीवन की अनवरत चाल थी।
पंखे पर बैठी चिड़िया
जैसे कमरे के हर धूलकण और हर वस्तु की कहानी सुन रही थी।
सात्र ने उसकी ओर देखा,
और उसकी मौन उपस्थिति
हवा में तैरती चेतना की तरह लग रही थी।
सत्र की दृष्टि
हर बर्तन, हर झाड़ू, हर कपड़े,
हर जूता, हर किताब पर टिक गई।
वे समझ रहे थे कि
यह सब केवल वस्तुएँ नहीं हैं।
यह सब साक्षी हैं,
हर दिन के अनुभवों की,
हर खुशी और हर उदासी की।
मैंने देखा—
झाड़ू हल्की मुस्कान देती हुई
साफ-सुथरे तख्त को निहार रही थी।
किचन की चलनी
अपने आटे की खुशबू से
थोड़ी गौरव महसूस कर रही थी।
रसोई के बर्तन
एक-दूसरे से फुसफुसा रहे थे—
“आज हमारा दिन है, सफाई के बाद।”
सिगरेट का धुआँ
सत्र की उपस्थिति में
धुंधला सा,
लेकिन जीवन की लहरों में घुल गया।
और तभी,
कमरे के कोने से एक सूफ़ियाना शेर उठकर आया,
धीमी आवाज़ में बोला—
“जो हर कण में रूह देख सके,
वही सच्चा मुसाफ़िर है;
न टूटता है, न गिरता है,
बस चलता है, अनुभव करता है।”
कमरा मौन हो गया।
सत्र ने तालाब की ओर देखा।
चूहे, कबूतर, मकड़ी, काकरोच, पंखे, बर्तन—
सब धीरे-धीरे अपनी जगह पर लौट गए।
लेकिन उनकी मौन उपस्थिति,
उनकी छोटी-छोटी चालें और संघर्ष
सत्र की दृष्टि में
अमर हो चुकी थीं।
मैंने चाय की ओर देखा,
सिगरेट की डिब्बी उठाई,
और मन ही मन सोचा—
“हर चीज़ में जीवन है,
हर सांस में दर्शन है,
और हर क्षण सूफ़ियाना संगीत।”
— मुकेश
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