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Friday, 13 March 2026

अध्याय – 18 : दरवाज़े पर दस्तक

 लघु उपन्यास – दूसरा खंड

अध्याय – 18 : दरवाज़े पर दस्तक


शाम

धीरे-धीरे

कमरे में उतर रही थी।


आकाश का रंग

नीले से धूसर हो चुका था।


खिड़की के बाहर

पेड़ की शाखाएँ

हवा के साथ

हल्के-हल्के हिल रही थीं।


मैं

मेज़ पर झुका

कुछ लिखने की कोशिश कर रहा था।


काग़ज़ पर

कुछ शब्द थे

पर वे अभी

वाक्य नहीं बने थे।


शायद

हर विचार को

शब्द बनने से पहले

थोड़ा समय चाहिए होता है।


कमरे में

घड़ी की टिक-टिक

धीरे-धीरे सुनाई दे रही थी।


तभी

मोबाइल की स्क्रीन

हल्के से चमकी।


साक्षी का संदेश था।


“अस्तित्व…

अगर आप बुरा न मानें

तो एक बात पूछूँ?”


मैं

स्क्रीन को देखता रहा।


अभी कुछ ही देर पहले

मैंने उसे

“पूछिए” लिखा था।


पर

उसके बाद

वह कुछ देर तक चुप रही।


जैसे

प्रश्न पूछने से पहले

वह भी

अपने शब्द चुन रही हो।


मैं

उत्तर पढ़ ही रहा था

कि अचानक


दरवाज़े पर

हल्की-सी दस्तक हुई।


ठक… ठक…


मैंने

कलम रख दी।


दरवाज़ा खोला।


सामने

मकान मालिक खड़े थे।


उनके हाथ में

पुराना-सा अख़बार था।


“अस्तित्व जी,”

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,

“थोड़ी देर बैठ सकते हैं?”


मैंने

दरवाज़ा खोल दिया।


वे अंदर आए।


कमरे को

धीरे-धीरे देखने लगे।


किताबें

मेज़

काग़ज़

खिड़की।


“आपका कमरा

हर बार

वैसा ही लगता है,”

उन्होंने कहा।


“शांत।”


मैं

हल्के से मुस्कुरा दिया।


वे

कुर्सी पर बैठ गए।


कुछ क्षण

चुप्पी रही।


फिर उन्होंने

अख़बार मोड़ते हुए कहा—


“आप

सारा दिन पढ़ते-लिखते रहते हैं न?”


मैंने सिर हिलाया।


“हाँ

कुछ वैसा ही।”


वे

कुछ देर सोचते रहे।


फिर बोले—


“अजीब बात है।”


“लोग

पूरी उम्र भागते रहते हैं

कुछ पाने के लिए।”


“और आप

एक कमरे में बैठकर

शायद

कुछ समझने की कोशिश करते हैं।”


मैंने

उत्तर नहीं दिया।


क्योंकि

उनकी बात में

थोड़ी सच्चाई थी।


उसी समय

मेज़ पर रखा मोबाइल

फिर चमका।


मैंने

अनायास उसकी ओर देखा।


साक्षी का नया संदेश था।


मकान मालिक

अभी भी बोल रहे थे—


“आप बुरा न मानें

तो एक बात पूछूँ?”


मैं

अचानक मुस्कुरा दिया।


आज

लगता था

हर कोई

मुझसे

कुछ पूछना चाहता था।


“पूछिए,”

मैंने कहा।


वे बोले—


“आप

अकेले रहते हैं…”


“कभी

अकेलापन नहीं लगता?”


कमरे में

कुछ क्षण

खामोशी फैल गई।


खिड़की से

हवा का एक झोंका आया।


मेज़ पर रखे काग़ज़

हल्के-से हिल गए।


मैंने

मोबाइल की स्क्रीन फिर देखी।


साक्षी का प्रश्न

अब पूरा लिखा था—


“अस्तित्व…

आपने कभी

किसी से प्रेम किया है?”


मैं

कुछ क्षण

बिलकुल शांत बैठा रहा।


एक तरफ

मकान मालिक का प्रश्न—


अकेलापन।


दूसरी तरफ

साक्षी का प्रश्न—


प्रेम।


जीवन

कभी-कभी

अजीब ढंग से

प्रश्न पूछता है।


मैंने

खिड़की के बाहर देखा।


पेड़ की शाखाएँ

अब भी हवा में हिल रही थीं।


और अचानक

मुझे लगा—


शायद

मनुष्य के जीवन में

दो ही प्रश्न

सचमुच महत्वपूर्ण होते हैं—


क्या वह अकेला है?


और


क्या उसने

कभी प्रेम किया है?


मैंने

धीरे से

साँस ली।


मकान मालिक

अब भी

मेरे उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे थे।


मोबाइल

अब भी

मेज़ पर चमक रहा था।


और मुझे लगा—


कहानी

अब

अपने सबसे गहरे मोड़ के पास

आ खड़ी हुई है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,

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