लघु उपन्यास
भाग – 19 : पश्चिम से पूर्व तक दर्शन का संगम
रात की चुप्पी अभी भी कमरे में थी।
मैंने सिगरेट का एक कश लिया और खिड़की से बाहर झाँका।
धुआँ धीरे-धीरे उठ रहा था,
जैसे विचारों का धुआँ हो,
जो अतीत और भविष्य के बीच तैर रहा हो।
सूत्रधार अपने आप में खो गया।
काफ्का की पंक्तियाँ आँखों के सामने तैर रही थीं,
और उनके बहाने वह पश्चिमी दर्शनकारों को याद करने लगा—
कैथरीन, हसेलर, नीट्शे और हीडगर—
जो जीवन की व्यथा, अस्तित्व और समय की जटिलताओं पर गहरी दृष्टि रखते थे।
“कितनी बार,” उसने सोचा,
“उनके विचार मेरे कमरे की निर्जीव वस्तुओं में उतरते हैं।
तखत, झाड़ू, चम्मच—
सभी की अपनी सन्नाटे वाली व्याख्या होती है,
जैसे वे भी मेरे विचारों में सम्मिलित हों।”
फिर उसने धीरे-धीरे पूर्व की ओर मन लगाया।
सांख्य दर्शन के तत्व याद आए—
पुरुष और प्रकृति,
सत्त्व, रजस, तमस की त्रिगुणात्मकता,
और कर्म के चक्र में प्रत्येक वस्तु और प्राणी का अपना स्थान।
“वास्तव में,” सूत्रधार ने सोचा,
“पश्चिम के दर्शन जहाँ अस्तित्व और व्यथा पर ध्यान देते हैं,
वहीं पूर्व का सांख्य दर्शन जीवन के संचालन, चेतना और कर्म के गहरे अर्थों को बताता है।
और दोनों मिलकर एक पुल बनाते हैं—
जहाँ निर्जीव और जीवित सबको अपना स्थान मिल सकता है।”
कमरे की वस्तुएँ—झाड़ू, कटोरी, प्लेट, कूकर—
धीरे से गूँज रही थीं,
“सत्र और सायमन की यादें तुम्हारे भीतर झरती हैं,
और हम सबका भी अस्तित्व तुम्हारे ध्यान में समाया है।”
सूत्रधार ने सिगरेट का एक और कश लिया,
और सोचने लगा—
न केवल पश्चिम और पूर्व,
बल्कि दूसरे दर्शन भी—
सूफी, ज़ेन, उपनिषद, और आधुनिक मनोवैज्ञानिक दृष्टियाँ—
सब उसके मन में एक धारा बन कर बह रही थीं।
और इस बीच, कमरे के कोनों में
पालतू जीव—चूहा, मकड़ी, कबूतर, और पंखे पर बैठी चिड़िया—
मौन होकर उसकी धारणाओं का गवाह बने थे।
वे भी महसूस कर रहे थे
कि सूत्रधार अब केवल घर और वस्तुओं में नहीं,
बल्कि समय, स्मृति और दर्शन के बहाव में खो गया है।
कमरा अपने आप में एक दर्शनशाला बन चुका था—
निर्जीव वस्तुएँ, पालतू जीव, किताबें, और लेखक का मन
एक सूत्रधार के रूप में
पूरब और पश्चिम के दर्शन को जोड़ रहे थे।
और अंत में,
एक सूफियाना शेर,
जिसका स्वर कमरे की गहराई में गूंजा—
“जहाँ विचार और अनुभव मिलते हैं,
वहीं जीवन का मार्ग स्पष्ट होता है;
पूर्व की चेतना, पश्चिम का तर्क,
और हर निर्जीव और जीवित का अपना दर्शन—
सब मिलकर बना देते हैं अनंत संगीत।”
सूत्रधार ने अपने सिगरेट का अंतिम कश लिया,
धुआँ बाहर हवा में घुल गया,
और वह धीरे-धीरे
गुमटी की चाय की ओर रुख करता है,
सत्र और सायमन दा बौआ की यादों को अपने भीतर संजोते हुए।
— मुकेश
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