लघु उपन्यास – दूसरा खंड
अध्याय – 20 : प्रस्ताव
सुबह
धीरे-धीरे
गली में उतर रही थी।
दूधवाले की साइकिल
फिर एक बार
दरवाज़ों के सामने रुक रही थी।
ट्रिन… ट्रिन…
मैं
खिड़की के पास बैठा
चाय पी रहा था।
मोबाइल
मेज़ पर पड़ा था।
रात की बातचीत
अब भी
मन में हल्के-हल्के घूम रही थी।
तभी
मोबाइल चमका।
साक्षी का संदेश था।
“अस्तित्व…”
“अगर मैं एक अजीब बात कहूँ
तो बुरा तो नहीं मानेंगे?”
मैंने लिखा—
“कहिए।”
कुछ क्षण
चुप्पी रही।
फिर
उसका संदेश आया—
“कभी मिलना चाहिए।”
मैं
कुछ देर
स्क्रीन को देखता रहा।
इतने वर्षों की दूरी
और अब
एक छोटा-सा प्रस्ताव।
मैंने
चाय का कप मेज़ पर रखा।
खिड़की से बाहर देखा।
गली में
एक बच्चा
स्कूल के लिए भाग रहा था।
जीवन
अपनी सामान्य गति से
चल रहा था।
पर भीतर
कुछ हल्का-सा बदल गया था।
मैंने
धीरे-धीरे लिखा—
“मिलना
कभी भी हो सकता है।”
“बस
समय को
उसका क्षण चुनने दीजिए।”
कुछ देर बाद
उसका उत्तर आया—
“तो
कभी अचानक मिलते हैं।”
मैं
उस वाक्य को पढ़कर
कुछ देर चुप रहा।
अचानक मिलना।
जीवन
शायद
हमेशा इसी तरह
मिलवाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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