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Friday, 13 March 2026

अध्याय – 19 : उत्तर

 लघु उपन्यास – दूसरा खंड

अध्याय – 19 : उत्तर


कमरे में

अब रात उतर आई थी।


लैम्प की पीली रोशनी

मेज़ पर फैले काग़ज़ों को

धीरे-धीरे उजाला दे रही थी।


मकान मालिक

अभी भी सामने बैठे थे।


उनका प्रश्न

अब भी हवा में था—


“अस्तित्व जी…

अकेलापन नहीं लगता?”


और उसी समय

मोबाइल की स्क्रीन पर

साक्षी का प्रश्न भी चमक रहा था—


“आपने कभी

किसी से प्रेम किया है?”


दो प्रश्न।


दो दिशाएँ।


पर शायद

दोनों का उत्तर

एक ही जगह छुपा था।


मैंने

कुछ क्षण आँखें बंद कर लीं।


फिर धीरे से कहा—


“अकेलापन

हमेशा बुरा नहीं होता।”


मकान मालिक

मुझे देखने लगे।


मैंने कहा—


“कभी-कभी

अकेलापन

हमें अपने भीतर ले जाता है।”


वे

चुपचाप सुनते रहे।


मैंने

धीरे से जोड़ा—


“और जहाँ मनुष्य

अपने भीतर पहुँचता है

वहीं

वह पहली बार

प्रेम को भी समझता है।”


वे

कुछ देर तक

मुझे देखते रहे।


फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ बोले—


“आपकी बातें

मेरी समझ से थोड़ी ऊपर हैं।”


हम दोनों

हँस पड़े।


वे उठे

और जाते-जाते बोले—


“अच्छा…

रात ज़्यादा मत जागिए।”


दरवाज़ा बंद हो गया।


कमरे में

फिर वही शांति फैल गई।


मैंने

मोबाइल उठाया।


साक्षी का प्रश्न

अब भी सामने था।


मैंने

धीरे-धीरे लिखा—


“हाँ।”


“शायद

कभी प्रेम हुआ था।”


कुछ क्षण

मैंने संदेश को देखा।


फिर

एक और पंक्ति जोड़ दी—


“पर वह

किसी व्यक्ति से ज़्यादा

एक अनुभव था।”


संदेश भेज दिया।


कमरे में

घड़ी की टिक-टिक

धीरे-धीरे सुनाई दे रही थी।


कुछ देर बाद

मोबाइल फिर चमका।


साक्षी ने लिखा—


“अनुभव?”


“प्रेम

अनुभव कैसे हो सकता है?”


मैंने

खिड़की के बाहर देखा।


आकाश में

कुछ तारे दिखाई दे रहे थे।


फिर लिखा—


“जैसे

कभी अचानक

हवा चलती है।”


“और हमें

पता भी नहीं चलता

कि वह कहाँ से आई।”


“बस

उसके स्पर्श से

मन बदल जाता है।”


कुछ क्षण

कोई उत्तर नहीं आया।


फिर

एक छोटा-सा संदेश आया—


“अस्तित्व…”


“आप

अभी भी

उतना ही अजीब बोलते हैं।”


मैं

हल्के से मुस्कुरा दिया।


मुकेश ,,,,,,,,,

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