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Friday, 13 March 2026

अध्याय – 21 : एक अधूरी मुलाक़ात

 लघु उपन्यास – दूसरा खंड

अध्याय – 21 : एक अधूरी मुलाक़ात


शाम का समय था।


शहर की सड़कें

धीरे-धीरे भीड़ से भर रही थीं।


मैं

बहुत दिनों बाद

कमरे से बाहर निकला था।


किसी विशेष कारण से नहीं।


बस

चलने का मन हुआ था।


कभी-कभी

मनुष्य

बिना कारण भी

चल पड़ता है।


शायद

अंदर कुछ बदलने लगता है।


मैं

पार्क के पास पहुँचा।


वहाँ

एक पुराना पीपल का पेड़ था।


मैं

कुछ देर वहीं

खड़ा रहा।


हवा

धीरे-धीरे चल रही थी।


उसी समय

मोबाइल में

एक संदेश आया।


साक्षी का।


“अस्तित्व…”


“आप अभी कहाँ हैं?”


मैंने लिखा—


“बस

एक पार्क के पास।”


कुछ क्षण बाद

उसका उत्तर आया—


“अजीब बात है।”


“मैं भी

अभी एक पार्क में हूँ।”


मैं

हल्के से मुस्कुराया।


शहर बड़ा था।


संयोग

इतनी आसानी से नहीं होते।


मैंने

मोबाइल जेब में रखा।


पेड़ की ओर देखा।


पत्तियाँ

हवा में हिल रही थीं।


उसी समय

दूर

पार्क के रास्ते पर

एक स्त्री चलती हुई दिखाई दी।


वह

धीरे-धीरे

पेड़ के पास से गुज़री।


हमारी नज़र

एक क्षण के लिए मिली।


फिर

वह आगे बढ़ गई।


मैं

कुछ क्षण

उसे देखता रहा।


फिर

धीरे से मुस्कुरा दिया।


शायद

वह साक्षी नहीं थी।


और शायद


कभी-कभी

मुलाक़ातें


बस

इतनी ही होती हैं—


एक क्षण की।


मोबाइल

फिर चमका।


साक्षी का संदेश था—


“अस्तित्व…”


“कभी न कभी

हम मिलेंगे।”


मैंने

धीरे से उत्तर लिखा—


“हाँ।”


“कभी न कभी।”


आकाश में

शाम गहराने लगी थी।


और मुझे लगा—


कहानी

यहाँ समाप्त नहीं हुई।


वह

बस

एक नए आरंभ के सामने

ठहर गई है।


मुकेश ,,,,,

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