लघु उपन्यास
भाग – 22 : दंगे के दिनों में सलोनी की याद
आज शहर कुछ अलग था।
सुबह की हवा में भी एक बेचैनी तैर रही थी।
गली असामान्य रूप से शांत थी,
जैसे किसी ने उसकी आवाज़ छीन ली हो।
दोपहर में खबर आई—
शहर में दंगा भड़क गया है।
कई इलाकों में कर्फ़्यू लगा दिया गया है।
मैं खिड़की पर खड़ा था।
सिगरेट का एक कश लिया
और सोचा—
कल तक जिन गलियों में मुर्गी वाले की आवाज़ गूँजती थी,
आज वहाँ सन्नाटा है।
मुर्गी वाला दोपहर में दिखा था,
पर उसके चेहरे पर डर साफ़ था।
मुर्गियाँ भी जैसे चुप थीं,
दाना खाते हुए बार-बार गर्दन उठा कर देख रही थीं।
दूध वाला भी जल्दी-जल्दी आया
और बिना रुके चला गया।
उसकी बाल्टी में दूध कम था
और आँखों में चिंता ज्यादा।
शाम तक खबर आई
कि कई जगहों पर पुलिस ने कर्फ़्यू लगा दिया है।
मैंने सोचा—
अब शायद कई दिनों तक बाहर निकलना मुश्किल होगा।
लिहाज़ा मैंने
सिगरेट की राशनिंग कर दी।
दिन में दो से ज़्यादा नहीं।
शाम को दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई।
दरवाज़ा खोला तो पान वाला था।
उसने जेब से सिगरेट का छोटा पैकेट निकाला
और धीरे से मेरी ओर बढ़ाते हुए बोला—
“भाई साहब,
बस यही बची थीं।
पुराना परिचय है इसलिए दे गया।
अब शायद कुछ दिन मिलना मुश्किल होगा।”
मैंने पैकेट लिया।
उसकी आँखों में भी वही डर था
जो पूरे शहर की हवा में घुल गया था।
वह जाते-जाते बोला—
“हालात ठीक नहीं हैं…
घर से कम निकलियेगा।”
दरवाज़ा बंद हुआ
तो कमरा फिर शांत हो गया।
आज झाड़ू भी चुप थी।
कूकर भी चुप।
पंखा भी जैसे धीरे घूम रहा था।
ऐसा लगा
घर का सारा साजो-सामान
दंगे की खबर सुनकर
अपनी-अपनी सोच में डूब गया हो।
मैंने सिगरेट जलाई।
धुआँ ऊपर उठा
और उसी धुएँ में
सलोनी का चेहरा उभर आया।
कितनी बार सोचा था
उसे फोन करूँ।
पर इन दिनों
हर आवाज़ में डर बस गया था।
और उसी धुएँ के बीच
मैंने उसके लिए एक नज़्म लिखी—
सलोनी के नाम
शहर जल रहा है
और गलियाँ खामोश हैं
लोग अपने-अपने घरों में
डर की चादर ओढ़े बैठे हैं
पर अजीब बात है सलोनी
इन सब के बीच
मुझे सबसे ज्यादा
तुम्हारी याद आ रही है
जैसे दंगों से ज्यादा
तुम्हारी खामोशी ने
मेरे शहर को घेरा हुआ हो
अगर तुम होती
तो शायद कहती—
“डर मत…
ये शहर भी एक दिन थक कर
फिर से इंसानों का हो जाएगा।”
नज़्म पूरी हुई
तो कमरे में फिर वही सन्नाटा था।
मैंने सिगरेट बुझाई
और खिड़की से बाहर देखा।
कर्फ़्यू वाली सड़क पर
एक कुत्ता चुपचाप चल रहा था।
और मुझे लगा—
आज सिर्फ़ इंसान ही नहीं,
पूरा शहर डर गया है।
कमरा भी,
मकान मालिक भी,
मुर्गी वाला भी,
दूध वाला भी,
पान वाला भी—
और शायद
मैं भी।
— मुकेश
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