“लाइफ़ पैक – 28 दिन की ज़िंदगी”
एक दिन जब
धरती के साए पेड़ कट जाएँगे,
नदियाँ
अपनी ही प्यास में
सूख जाएँगी,
और विज्ञान
इतना आगे बढ़ चुका होगा
कि
ईश्वर भी
एक “थ्योरी” भर रह जाएगा—
तब
इंसान
दुकानों पर नहीं,
स्क्रीन पर जाएगा
और खरीदेगा
“लाइफ़ पैक”
ऑफ़र चल रहा होगा
“एक महीने की ज़िंदगी
अब सिर्फ़ 28 दिन में!”
लोग
खुश होंगे
जैसे
उन्हें कोई सौदा
बहुत सस्ता मिल गया हो।
कोई लेगा
“प्रिमियम लाइफ़”
जिसमें
थोड़ी-सी हँसी,
दो-चार रिश्ते,
और
एक सीमित-सी मोहब्बत
फ्री मिलेगी।
कोई
“बेसिक प्लान” में
सिर्फ़ साँसें खरीदेगा
बिना सपनों के,
बिना एहसास के।
और
गरीब आदमी
वह
किसी कोने में बैठकर
पुराने दिनों को याद करेगा
जब
ज़िंदगी
खरीदी नहीं जाती थी,
जी जाती थी।
एक बच्चा
अपने पिता से पूछेगा
“पापा,
ये पेड़ क्या होता है?”
पिता
थोड़ा सोचेगा,
फिर गूगल खोलेगा
और कहेगा
“बेटा,
ये एक पुरानी चीज़ है
जो ऑक्सीजन देती थी…”
बच्चा हँसेगा
“ऑक्सीजन भी
अब ऐप से मिलती है ना!”
नदियों की जगह
स्क्रीनसेवर होंगे,
जहाँ पानी
बस बहता हुआ दिखेगा
पर
प्यास नहीं बुझाएगा।
और प्रेम
वह भी
सब्सक्रिप्शन पर होगा
“7 दिन का ट्रायल
बिना किसी कमिटमेंट के!”
रिश्ते
ऑटो-रिन्यू पर चलेंगे,
और
जैसे ही बैलेंस खत्म होगा
लोग
एक-दूसरे से
कट जाएँगे।
किसी रात
जब नेटवर्क चला जाएगा
और
सारे सर्वर
अचानक बंद हो जाएँगे
तब
इंसान
पहली बार
सच में अकेला होगा।
वह ढूँढेगा
कोई पेड़,
कोई नदी,
कोई असली स्पर्श…
पर
सब कुछ
इतिहास बन चुका होगा।
और उस सन्नाटे में
एक आवाज़ गूँजेगी
धीरे-धीरे,
भीतर से
“तुमने
ज़िंदगी को
डेटा समझ लिया था…”
और तब
कोई रिचार्ज
काम नहीं आएगा
क्योंकि
ज़िंदगी
नेटवर्क नहीं थी,
एक एहसास थी
जिसे तुमने
समय रहते
अनलिमिटेड नहीं किया।
मुकेश ,,,,,,,,
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