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Monday, 16 March 2026

लघु उपन्यास : अस्तित्व और साक्षी - भाग – 3 -अध्याय 15 : पुरानी पहचान

 लघु उपन्यास : अस्तित्व और साक्षी - भाग – 3 -अध्याय 15 : पुरानी पहचान

शाम अब पूरी तरह उतर चुकी थी।

आकाश का रंग गहरा नीला हो गया था और पश्चिम में सूरज की आख़िरी रोशनी धीरे-धीरे धुंधली पड़ रही थी।

नर्मदा का पानी अब दिन की तरह चमकीला नहीं था।

वह शांत, गहरा और लगभग रहस्यमय दिखाई दे रहा था—जैसे उसकी सतह के नीचे बहुत कुछ छिपा हो।

घाट की सीढ़ियों पर खड़े चार लोगों के बीच भी अब एक अलग तरह की निस्तब्धता थी।

अस्तित्व की दृष्टि बार-बार नील और प्रवासी के बीच घूम रही थी।

नील का चेहरा पहले जैसा सहज नहीं था।

“तुम आ गए, नील।”

प्रवासी के शब्द अब भी हवा में गूँज रहे थे।

अस्तित्व ने धीरे से पूछा

“तुम दोनों एक-दूसरे को जानते हो?”

नील ने गहरी साँस ली।

कुछ क्षण तक वह नदी की ओर देखता रहा।

फिर उसने धीमे स्वर में कहा

“पूरी तरह नहीं…

लेकिन शायद हाँ।”

साक्षी ने आश्चर्य से पूछा

“इसका क्या मतलब है?”

नील ने उत्तर देने से पहले प्रवासी की ओर देखा।

“शायद इन्हें बताना चाहिए,” उसने कहा।

प्रवासी मुस्कराया।

“नहीं।

कुछ  बातें उस व्यक्ति को ही बतानी चाहिए जिसने उन्हें अनुभव किया हो।”

नील कुछ क्षण चुप रहा।

फिर उसने धीरे-धीरे कहना शुरू किया

“लगभग पाँच साल पहले…

मैं पहली बार इस घाट पर आया था।”

अस्तित्व चौंका।

“तुमने हमें कभी नहीं बताया।”

नील ने हल्की मुस्कान के साथ कहा

“क्योंकि उस समय मुझे भी समझ में नहीं आया था कि जो हुआ वह क्या था।”

नदी की धारा की आवाज़ अब और स्पष्ट सुनाई दे रही थी।

नील बोलता रहा

“मैं उस समय अकेला यात्रा कर रहा था।

जीवन में बहुत उलझन थी…

और शायद मुझे कहीं शांति चाहिए थी।”

साक्षी ध्यान से सुन रही थी।

“मैं इस घाट पर आया…

और यहीं बैठा था।”

नील ने उस सीढ़ी की ओर इशारा किया जहाँ वे कुछ देर पहले बैठे थे।

“और तब मेरी मुलाकात इनसे हुई।”

प्रवासी शांत खड़ा था।

अस्तित्व ने पूछा

“फिर?”

नील कुछ क्षण रुका।

“उन्होंने मुझसे एक अजीब सवाल पूछा था।”

“क्या?”

नील ने धीरे से कहा

“उन्होंने पूछा था

‘क्या तुम उस व्यक्ति को जानते हो

जो अभी तक यहाँ नहीं आया है?’ ”

अस्तित्व की भौंहें हल्की सिकुड़ गईं।

“यह कैसा सवाल है?”

नील ने उसकी ओर देखा।

“मैंने भी यही पूछा था।”

कुछ क्षण की चुप्पी रही।

फिर नील ने कहा

“तब इन्होंने कहा था

‘एक दिन तुम फिर यहाँ आओगे…

और उस व्यक्ति के साथ आओगे।’ ”

साक्षी की आँखों में हल्का आश्चर्य था।

“और वह व्यक्ति…”

नील ने अस्तित्व की ओर देखा।

“…तुम थे।”

अस्तित्व कुछ क्षण तक बिल्कुल शांत खड़ा रहा।

जैसे उसने अभी जो सुना है उसे समझने में समय लग रहा हो।

“लेकिन यह कैसे संभव है?” उसने धीरे से कहा।

प्रवासी ने उत्तर दिया

“संभव और असंभव का निर्णय मनुष्य बहुत जल्दी कर देता है।”

साक्षी अब तक शांत थी।

लेकिन इस बार उसने पूछा

“क्या उस दिन आपने नील से और कुछ कहा था?”

प्रवासी ने नदी की ओर देखते हुए कहा—

“हाँ।”

“क्या?”

“मैंने उससे कहा था कि जब वह फिर यहाँ आए…

तो ध्यान से देखना।”

“किसे?”

प्रवासी ने धीरे-धीरे उत्तर दिया

“नदी को नहीं।”

फिर उसने अस्तित्व की ओर देखा।

“…उस व्यक्ति को

जो नदी को देख रहा होगा।”

अस्तित्व के भीतर एक हल्की कंपकंपी-सी हुई।

जैसे किसी ने उसके भीतर की किसी पुरानी स्मृति को छू लिया हो।

नील ने धीरे से कहा

“तब मुझे लगा था कि यह सब केवल एक रहस्यमय बातचीत है।

लेकिन जब तुमने मुझे अपने सपने के बारे में बताया…”

वह रुक गया।

साक्षी ने पूछा

“तो?”

नील ने कहा

“तब मुझे पहली बार लगा कि शायद यह यात्रा संयोग नहीं है।”

नदी का प्रवाह अब गहरा अँधेरा समेटे बह रहा था।

दूर कहीं मंदिर की घंटी की हल्की आवाज़ आई।

कुछ क्षण तक कोई कुछ नहीं बोला।

फिर अस्तित्व ने प्रवासी से पूछा

“अगर यह सब सच है…

तो इसका अर्थ क्या है?”

प्रवासी ने उत्तर देने से पहले नदी की ओर देखा।

उसकी आँखों में अब एक अलग-सी गहराई थी।

“अर्थ अभी नहीं बताया जा सकता।”

नील ने पूछा

“क्यों?”

प्रवासी ने हल्के से मुस्कराकर कहा

“क्योंकि तुम अभी केवल कहानी के बीच में खड़े हो।”

साक्षी ने धीरे से कहा

“और आगे?”

प्रवासी ने घाट की सीढ़ियों की ओर इशारा किया।

“आगे वह जगह है

जहाँ यह कहानी शुरू हुई थी।”

अस्तित्व ने पूछा

“कहाँ?”

प्रवासी ने घाट के किनारे खड़े पीपल के पुराने वृक्ष की ओर देखा।

“उस वृक्ष के पास।”

तीनों ने एक साथ उस वृक्ष की ओर देखा।

उसकी जड़ें पत्थर की सीढ़ियों के बीच गहराई तक फैली हुई थीं।

और उस क्षण अस्तित्व को अचानक अपने सपने का एक और दृश्य याद आया

वही वृक्ष…

और उसकी जड़ों के पास रखा हुआ कोई पुराना पत्थर।

अस्तित्व ने धीरे से कहा

“मैंने इसे पहले देखा है।”

प्रवासी ने शांत स्वर में उत्तर दिया

“हाँ।”

फिर उसने कहा

“क्योंकि कुछ यात्राएँ

हम पहली बार नहीं करते।”

नर्मदा की धारा उस रात भी वैसे ही बह रही थी।

लेकिन अब घाट पर खड़े चार लोगों के लिए

वह केवल एक नदी नहीं रह गई थी।


मुकेश,,,,,,,,, 



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