लघु उपन्यास : अस्तित्व और साक्षी -भाग – 3-अध्याय 16 : पीपल की जड़ों के नीचे
शाम अब गहराकर लगभग रात में बदल चुकी थी।
आकाश में कुछ तारे दिखाई देने लगे थे और नदी का पानी अब एक गहरी काली रेखा की तरह बहता हुआ प्रतीत हो रहा था।
घाट की सीढ़ियों के पास खड़ा वह पुराना पीपल का वृक्ष हवा में हल्का-हल्का हिल रहा था।
उसकी जड़ें पत्थर की सीढ़ियों को चीरकर नीचे तक फैली हुई थीं—मानो वह केवल वृक्ष न होकर समय का कोई पुराना साक्षी हो।
अस्तित्व, साक्षी और नील धीरे-धीरे उस वृक्ष की ओर बढ़े।
प्रवासी पीछे-पीछे चल रहा था।
जैसे उसे पता हो कि आगे क्या होने वाला है।
अस्तित्व के मन में अजीब-सी हलचल थी।
सपने का दृश्य अब और स्पष्ट होने लगा था
नदी का वही किनारा…
पीपल का वही वृक्ष…
और उसकी जड़ों के पास रखा हुआ एक पुराना पत्थर।
वह वृक्ष के पास पहुँचा।
कुछ क्षण तक उसने जड़ों के बीच ध्यान से देखा।
वहाँ सचमुच एक चौड़ा, समतल पत्थर था—जैसे किसी ने बहुत पहले उसे वहीं रखा हो।
नील ने पूछा
“क्या यही है?”
अस्तित्व ने धीरे से कहा
“सपने में… यही था।”
साक्षी भी झुककर देखने लगी।
पत्थर की सतह पर समय के निशान थे।
लेकिन बीच में हल्की-सी खुदाई दिखाई दे रही थी।
जैसे किसी ने बहुत पहले उस पर कुछ उकेरा हो।
प्रवासी ने शांत स्वर में कहा
“इसे पलटकर देखो।”
अस्तित्व ने पत्थर को पकड़कर धीरे-धीरे उठाया।
वह भारी था।
जैसे वह केवल पत्थर न होकर किसी पुराने रहस्य का भार लिए हुए हो।
पत्थर पलटते ही नीचे की मिट्टी दिखाई दी।
और मिट्टी के बीच एक छोटा-सा धातु का डिब्बा रखा हुआ था।
नील ने आश्चर्य से कहा
“यह यहाँ कैसे…?”
साक्षी की आँखों में एक गहरी चमक थी।
“शायद इसी के लिए हमें यहाँ बुलाया गया है।”
अस्तित्व कुछ क्षण उस डिब्बे को देखता रहा।
फिर उसने उसे सावधानी से उठाया।
धातु पुरानी थी—शायद कई वर्षों से मिट्टी के नीचे रही हो।
उसने धीरे से ढक्कन खोला।
अंदर एक छोटा-सा कागज़ का मोड़ा हुआ टुकड़ा था।
और उसके नीचे एक बहुत पुराना सिक्का।
नील ने कहा
“कागज़ खोलो।”
अस्तित्व ने कागज़ को सावधानी से खोला।
उस पर हाथ से लिखी हुई कुछ पंक्तियाँ थीं।
लिखावट थोड़ी धुंधली हो चुकी थी, लेकिन पढ़ी जा सकती थी
“अगर तुम यहाँ तक पहुँचे हो,
तो इसका अर्थ है कि यात्रा शुरू हो चुकी है।
नदी तुम्हें केवल वह नहीं दिखाएगी
जो बाहर है
वह तुम्हें वह भी दिखाएगी
जो तुम्हारे भीतर छिपा है।”
अस्तित्व कुछ क्षण तक उस कागज़ को देखता रहा।
फिर उसने धीरे से पूछा
“यह किसने लिखा?”
प्रवासी ने उत्तर देने में थोड़ी देर की।
फिर उसने कहा
“जिसने यह कहानी शुरू की थी।”
नील ने तुरंत पूछा
“कौन?”
प्रवासी ने सीधा उत्तर नहीं दिया।
उसने अस्तित्व की ओर देखा।
“क्या तुम्हें अपने सपने का कोई और हिस्सा याद है?”
अस्तित्व ने आँखें बंद कर लीं।
कुछ क्षण तक केवल नदी की आवाज़ सुनाई देती रही।
फिर एक धुंधली छवि उभरी
पीपल का यही वृक्ष…
और कोई व्यक्ति जो इस पत्थर को मिट्टी में रख रहा था।
अस्तित्व ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।
उसकी आवाज़ बहुत हल्की थी।
“सपने में…
मैंने किसी को यह पत्थर रखते हुए देखा था।”
नील ने पूछा
“कौन?”
अस्तित्व ने उत्तर देने से पहले प्रवासी की ओर देखा।
फिर उसने कहा
“शायद…
वह व्यक्ति मैं ही था।”
साक्षी ने चुपचाप उसे देखा।
उसकी आँखों में आश्चर्य नहीं था—जैसे वह इस उत्तर की संभावना पहले से जानती हो।
नील ने धीमे स्वर में कहा
“यह कैसे संभव है?”
प्रवासी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा
“संभव है… अगर समय को केवल सीधी रेखा की तरह न देखा जाए।”
नदी की हवा अब थोड़ी ठंडी हो गई थी।
पीपल की पत्तियाँ अचानक तेज़ी से हिलने लगीं।
अस्तित्व अब भी उस कागज़ को पकड़े खड़ा था।
फिर उसने धीरे से पूछा
“अगर यह सब सच है…
तो इसका अगला हिस्सा क्या है?”
प्रवासी ने नदी की ओर देखा।
कुछ क्षण बाद उसने कहा
“अगला हिस्सा अभी शुरू होगा।”
साक्षी ने पूछा
“कैसे?”
प्रवासी ने उस पुराने सिक्के की ओर इशारा किया जो डिब्बे में पड़ा था।
“क्योंकि यह सिक्का केवल संकेत नहीं है।”
नील ने उत्सुकता से पूछा
“तो क्या है?”
प्रवासी ने धीरे-धीरे कहा
“यह उस व्यक्ति की पहचान है
जिसने यह सब शुरू किया था।”
अस्तित्व ने सिक्का उठाया।
उसकी सतह पर समय की धूल थी।
लेकिन जब उसने उसे साफ़ किया तो उस पर एक छोटा-सा चिन्ह दिखाई दिया—
एक वृक्ष…
और उसके नीचे बहती हुई नदी।
अस्तित्व ने धीरे से कहा
“यह चिन्ह… मैंने पहले देखा है।”
साक्षी ने पूछा
“कहाँ?”
अस्तित्व ने उसकी ओर देखा।
“तुम्हारी डायरी में।”
मुकेश ,,,,,,
No comments:
Post a Comment