लघु उपन्यास
भाग – 3 : रात और सड़क
सिगरेट की डिब्बी जेब में रखकर
मैं धीरे-धीरे लौटने लगता हूँ।
गली अब पहले से ज़्यादा शांत है।
जैसे किसी ने
उसके सारे शब्द समेटकर
किसी अदृश्य अलमारी में रख दिए हों।
सड़क
मेरे पैरों के नीचे फैली हुई है।
दिन में
यही सड़क
लोगों के कदमों से भरी रहती है
रिक्शे, मोटर, आवाज़ें, धूल,
और जल्दी में भागते हुए चेहरे।
पर रात में
यह सड़क
अचानक बहुत अकेली हो जाती है।
जैसे कोई औरत
जो दिन भर
घर भर की बातों में उलझी रही हो
और अब
सबके सो जाने के बाद
चुपचाप आँगन में बैठी हो।
मैं चलता हूँ
और सड़क
मेरे साथ चलने लगती है।
सामने
एक स्ट्रीट लाइट खड़ी है।
उसकी पीली रोशनी
धीरे-धीरे जमीन पर गिर रही है
जैसे कोई बूढ़ा आदमी
अपनी बची हुई यादें
धरती पर रख रहा हो।
उस रोशनी में
मेरा साया लंबा हो जाता है।
मैं उसे देखता हूँ।
कभी-कभी लगता है
कि मेरा साया
मुझसे ज़्यादा धैर्यवान है।
वह बिना शिकायत
हर जगह मेरे साथ चलता है।
सड़क के किनारे
दो कुत्ते बैठे हैं।
वे मुझे देखते हैं
फिर धीरे से सिर मोड़ लेते हैं।
जैसे उन्हें
मेरी कहानी पहले से पता हो।
रात की हवा
हल्की-सी ठंडी है।
वह मेरे चेहरे से टकराकर
धीरे से गुजर जाती है
जैसे कोई पुरानी परिचित
बिना बोले
सिर्फ़ हाल पूछकर चली गई हो।
मैं एक सिगरेट निकालता हूँ।
माचिस जलती है
एक छोटी-सी आग
अंधेरे के खिलाफ़
अपना छोटा-सा विरोध दर्ज कराती है।
धुआँ ऊपर उठता है।
आसमान की तरफ़।
आसमान
आज बहुत चुप है।
उसमें कुछ तारे हैं
जो इतनी दूर हैं
कि शायद उन्हें
मेरी सिगरेट का धुआँ भी
एक छोटी-सी कहानी लगता होगा।
मैं कुछ देर
गली के मोड़ पर रुकता हूँ।
यहीं से
मेरा कमरा दिखता है।
उसकी खिड़की
अंधेरे में डूबी हुई है।
जैसे वह भी
मेरे लौटने का इंतज़ार कर रही हो।
मुझे अचानक लगता है
कि कमरे की चीज़ें
अभी भी
मेरी प्रतीक्षा में होंगी।
ऐश-ट्रे
थोड़ी और भरने के लिए।
झाड़ू
थोड़ी और धूल इकट्ठा करने के लिए।
और वह चम्मच
जिस पर
हलवे की चाशनी
अब भी सूख रही होगी।
मैं धीरे-धीरे
सीढ़ियाँ चढ़ने लगता हूँ।
रात
नीचे गली में
खड़ी रह जाती है।
और मेरा कमरा
दरवाज़े के उस पार
शायद फिर से
मुझसे बात करने के लिए
तैयार बैठा है।
मुकेश ,,,,,,
No comments:
Post a Comment