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Tuesday, 10 March 2026

भाग – 2 : सिगरेट की दुकान वाला

 लघु उपन्यास

भाग – 2 : सिगरेट की दुकान वाला

कमरे से बाहर निकलते ही

रात मेरी तरफ़ देखती है।


जैसे मैं उसका

पुराना परिचित हूँ।


गली में हल्की-सी ठंड है

और बिजली के खंभे पर टँगा पीला बल्ब

धीरे-धीरे झपक रहा है

मानो वह भी

नींद और जाग के बीच

किसी दार्शनिक विचार में अटका हो।


मैं चप्पलें घसीटता हुआ

गली के मोड़ तक पहुँचता हूँ।


वहीं

सिगरेट की एक छोटी-सी दुकान है।


दुकान क्या

एक लकड़ी का बक्सा,

जिस पर एक टीन की छत

और पीछे दीवार से टिका

एक बूढ़ा-सा आदमी।


वह मुझे देखते ही

हल्का-सा मुस्कुराता है।


जैसे उसे पहले से पता हो

कि मैं आने वाला हूँ।


“वही?”

वह पूछता है।


मैं सिर हिला देता हूँ।


सालों से

हमारी बातचीत

इसी एक शब्द में सिमटी हुई है

“वही।”


वह बिना देखे

पीछे की तरफ़ हाथ बढ़ाता है

और उसी ब्रांड की

एक डिब्बी निकालकर

मेरे सामने रख देता है।


कभी-कभी मुझे लगता है

कि उसे

मेरे बारे में

मुझसे ज़्यादा पता है।


उसे मालूम है

मैं कब आता हूँ,

कितनी सिगरेट पीता हूँ,

और किस दिन

थोड़ा ज़्यादा उदास होता हूँ।


दुकान के ऊपर

कुछ पुराने पोस्टर चिपके हैं।


एक फिल्म का पोस्टर

जिसकी नायिका

अब शायद दादी बन चुकी होगी।


एक देवता की तस्वीर

जिसके माथे पर

अगरबत्ती की राख

जमी हुई है।


और एक कैलेंडर

जो पिछले साल का है

पर उसे किसी ने

उतारने की ज़रूरत नहीं समझी।


दुकान वाला

धीरे-धीरे बीड़ी सुलगा रहा है।


मैं उससे पूछता हूँ

“आज ठंड कुछ ज़्यादा है।”


वह हँसता है।


“ठंड नहीं है बाबू…

बस रात थोड़ी खाली है।”


उसका यह जवाब

मेरे अंदर

कहीं गहरे उतर जाता है।


मैं पहली सिगरेट सुलगाता हूँ।


धुआँ ऊपर उठता है

और बल्ब की पीली रोशनी में

धीरे-धीरे घुल जाता है।


दुकान वाला

मुझे ध्यान से देख रहा है।


फिर कहता है


“आपके कमरे में

बहुत चीज़ें होंगी।”


मैं चौंकता हूँ।


“कैसे?”


वह कंधे उचकाता है।


“जो आदमी

इतनी सिगरेट पीता है

उसके कमरे में

अक्सर बहुत बातें होती हैं।”


मैं हँस देता हूँ।


शायद

वह ठीक कह रहा है।


मेरे कमरे में

सिर्फ़ चीज़ें नहीं हैं

वे सब

धीरे-धीरे बोलने लगी हैं।


मैं पैसे देता हूँ।


वह गिनता नहीं।


बस

डिब्बी मेरी तरफ़ सरका देता है

जैसे कोई पुराना रिश्ता

औपचारिकताओं से ऊपर हो।


मैं लौटने लगता हूँ।


पीछे से

वह आवाज़ देता है


“बाबू…”


मैं मुड़ता हूँ।


वह मुस्कुराकर कहता है


“आज कम पीना।”


मैं कुछ नहीं कहता।


बस सिर हिलाकर

गली की तरफ़ चल देता हूँ।


रात

फिर मेरे साथ चलने लगती है।


और मुझे लगता है

कि शायद

दुनिया में


सबसे ज़्यादा बातें

दो जगहों पर होती हैं


एक

किसी कवि के कमरे में।


और दूसरी

सिगरेट की दुकान पर।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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