भाग – 1 : कमरा जो मुझसे बात करता है
कमरे में दाख़िल होते ही
सबसे पहले ऐश-ट्रे मेरी तरफ़ देखती है।
वह लगभग भर चुकी है
सिगरेट के बुझे हुए ठुठकों से।
जैसे किसी छोटे-से युद्ध के बाद
गिरे हुए सैनिकों की भीड़ हो।
मैं उसे देखता हूँ
वह मुझे देखती है।
वह जैसे शिकायत करती है
“तुम हर रात मुझे भर देते हो
और सुबह मुझे खाली करना भूल जाते हो।”
मैं मुस्कुरा देता हूँ।
फर्श पर भी
कुछ ठुठके पड़े हैं।
वे ऐश-ट्रे की सीमा से बाहर
निकल आए विद्रोही हैं,
जिन्होंने आख़िरी कश के बाद
मेरी उँगलियों से छूटकर
अपनी जगह खुद चुन ली।
कमरे में
खाली सिगरेट की डिब्बियाँ भी हैं
यत्र-तत्र बिखरी हुई।
अधिकतर
एक ही ब्रांड की।
सालों से
मैं उसी ब्रांड का आदमी हूँ।
कभी-कभी लगता है
सिगरेट भी
रिश्तों की तरह होती है
एक बार आदत पड़ जाए
तो आदमी
उसे बदल नहीं पाता।
तख़्त के नीचे
एक झाड़ू पड़ी है।
कई दिनों से
वह मेरी तरफ़ देख रही है।
उसकी आँखों में
थोड़ी-सी नाराज़गी है,
थोड़ी-सी उदासी।
वह जैसे कहती है
“मैं यहाँ सफ़ाई के लिए आई थी,
और तुमने मुझे
धूल का हिस्सा बना दिया।”
मैं झुककर
उसे बाहर निकालने की सोचता हूँ
फिर
सोच ही रह जाता हूँ।
सिंक की तरफ़ नज़र जाती है।
वहाँ
एक चाय का मग पड़ा है।
उसके तल में
आख़िरी घूँट चाय
अब भी ठहरा हुआ है।
जैसे वह पूछ रहा हो
“मुझे अधूरा क्यों छोड़ दिया?”
मैं जवाब नहीं देता।
सिंक में
एक जूठी प्लेट भी है
जो कई दिनों से
कुछ गंदे बर्तनों के बीच
लावारिस-सी छुपी हुई है।
और एक चम्मच
हलवे की चाशनी में लिपटा हुआ
आराम से लेटा है।
उस चम्मच को देखते ही
मुझे वह दिन याद आता है
जब तुमने हलवा बनाया था।
घर में
बस दो चुटकी आटा था
और थोड़ी-सी शक्कर।
फिर भी
तुमने उसे ऐसे पकाया
जैसे कोई बड़ी दावत हो।
हलवा
मुझे ज़्यादा पसंद नहीं।
पर उस दिन
मैंने बिना शिकायत
दो बार खाया था।
शायद
हलवा अच्छा था।
या शायद
तुम।
सिंक में
एक टी-पैन भी पड़ा है
मुँह बाए
थोड़ी-सी चायपत्ती
अपने भीतर समेटे हुए।
जैसे वह भी
किसी बातचीत के ख़त्म होने के बाद
उबासी ले रहा हो।
कमरे के कोने में
जालों का एक छोटा-सा ब्रह्मांड है।
उसमें
एक मकड़ी लटकी हुई है।
निस्पृह।
शांत।
वह अपने जाल को
इतनी तन्मयता से बुन रही है
जैसे उसे
मेरे कमरे की अव्यवस्था से
कोई शिकायत ही न हो।
कभी-कभी लगता है
वह मुझसे ज़्यादा व्यवस्थित है।
शायद
मैं धीरे-धीरे
फिलॉस्फ़र होता जा रहा हूँ।
दरवाज़े के पास
एक जूता पड़ा है।
उसका साथी
तख़्त के नीचे है।
दोनों
अलग-अलग दिशाओं में पड़े हुए
जैसे किसी पुराने झगड़े के बाद
बात न कर रहे हों।
और चप्पलें
वे दरवाज़े के पास
हल्की-सी अधीरता से
मुझे देख रही हैं।
जैसे कह रही हों
“चलो, बाहर चलते हैं।”
मैं कमरे को
एक बार फिर देखता हूँ।
यह कमरा
असल में कमरा नहीं है
यह मेरी ज़िंदगी का
एक छोटा-सा संग्रहालय है।
यहाँ हर चीज़
या तो किसी याद की रखवाली कर रही है
या किसी इंतज़ार की।
मैं जेब टटोलता हूँ।
सिगरेट ख़त्म हो गई है।
कमरे की चीज़ें
एक साथ
मेरी तरफ़ देखती हैं।
मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ता हूँ।
“अभी आता हूँ,”
मैं धीरे से कहता हूँ।
और बाहर निकल जाता हूँ
सिर्फ़
सिगरेट लाने के लिए।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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