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Monday, 9 March 2026

अगर किसी दिन तुम मेरे कमरे पर आओ

 अगर किसी दिन तुम मेरे कमरे पर आओ

अगर किसी दिन

तुम मेरे कमरे पर आओ,

तो सबसे पहले

मैं यही सोचने लगूँगा—


तुम्हें बैठाऊँ कहाँ?


कुर्सी पर

किताबों का ढेर रखा है,

मेज़ पर

काग़ज़ों की उलझी हुई बस्ती।


बिस्तर पर

कुछ अधूरी कविताएँ सो रही हैं,

और खिड़की के पास

कप में ठंडी हुई चाय

अब भी इंतज़ार कर रही है।


मैं थोड़ा-सा घबराऊँगा,

थोड़ा-सा मुस्कुराऊँगा


क्योंकि

मेरे कमरे की बेतरतीबी

दरअसल

मेरे दिनों की कहानी है।


शायद

मैं जल्दी-जल्दी

किताबें समेटने लगूँ,

काग़ज़ों को

एक तरफ़ खिसकाने लगूँ।


और फिर

थककर कह दूँ—


“तुम यहीं बैठ जाओ…

मेरे पास।”


क्योंकि सच तो यह है

कि मेरे इस छोटे-से कमरे में


सबसे सही जगह

कोई कुर्सी नहीं—


बल्कि

वही है

जहाँ तुम

मेरे पास बैठ जाओ।


मुकेश ,,,,,,,

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