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Monday, 9 March 2026

तुमसे मिलने आऊँ तो खिचड़ी बनाना

 तुमसे मिलने आऊँ

तो कोई बड़ी तैयारी मत करना।


न मिठाइयाँ,

न कई तरह के पकवान—


बस

धीरे-धीरे चढ़ा देना

चूल्हे पर

थोड़ी-सी दाल

और थोड़ा-सा चावल।


तुम्हारे हाथ की

सादी-सी खिचड़ी

दुनिया के

सबसे बड़े भोज से

ज़्यादा सच्ची लगती है।


उसमें

हल्दी की हल्की-सी धूप होती है,

घी की

नर्म-सी खुशबू होती है,

और तुम्हारे हाथों का

वो अपनापन

जो किसी मसाले में नहीं मिलता।


मैं आऊँ

तो बस

दो कटोरियाँ रखना—

एक तुम्हारे लिए

एक मेरे लिए।


और अगर हो सके

तो खिड़की के पास बैठेंगे,

धीरे-धीरे खाते हुए

शाम को उतरते देखेंगे।


क्योंकि सच कहूँ


तुम्हारे हाथ की खिचड़ी

सिर्फ़ खाना नहीं,


वो

एक छोटी-सी दुनिया है

जहाँ

दो लोग

थोड़ी देर के लिए

बिलकुल घर जैसा

महसूस कर लेते हैं


मुकेश ,,,,,,,,

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