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Monday, 23 March 2026

इश्क़ दरवाज़ा नहीं, एक सफ़र है…

इश्क़ दरवाज़ा नहीं, एक सफ़र है…


जहाँ कोई दस्तक काम नहीं आती,

कोई चाबी नहीं चलती

बस चलना पड़ता है…

धीरे-धीरे, भीतर की ओर।


ये राह सीधी नहीं होती,

कभी यादों की धूप जलाती है,

कभी जुदाई की रात

रास्ता छुपा लेती है।


कदम थकते हैं,

सवाल उठते हैं

“क्या ये वही मंज़िल है

जिसे दिल ने चुना था?”


मगर इश्क़—

मंज़िल नहीं पूछता,

वो बस चलाता है…


कभी किसी के साथ,

कभी बिल्कुल अकेले—

पर हर मोड़ पर

तुम्हें तुमसे मिलाता है।


और जब सफ़र लंबा हो जाता है,

तो समझ आता है


जिसे पाने निकले थे,

वो तो रास्ते में ही

तुम्हारे भीतर बस चुका था…


क्योंकि इश्क़

किसी तक पहुँचने का नाम नहीं,

खुद में उतर जाने का हुनर है…


मुकेश ,,,,,

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