रात, रातरानी और तुम
तीनों में एक ही राज़ बसा है,
धीरे-धीरे खुलने वाला,
और पूरी तरह कभी न खुलने वाला।
रात की स्याही में
तुम्हारी परछाईं घुलती है,
जैसे ख़ामोशी भी
कोई इबादत बन गई हो।
रातरानी की महक
तुम्हारी याद की तरह
बिना दिखे
हर ओर छा जाती है।
और तुम…
जैसे इस पूरी रात का मर्म,
जिसे महसूस तो किया जा सकता है,
पर कहा नहीं जा सकता।
मुकेश ,,,,,
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