तुम…
और हरसिंगार के फूलों से लदी डाली
दोनों में एक ही सी सादगी है,
जो चुपचाप दिल पर उतरती है।
सुबह की ओस में भीगे हुए
वे सफ़ेद-नारंगी फूल,
जैसे तुम्हारी मुस्कान के टुकड़े हों
बिखरे हुए, फिर भी पूरे।
तुम खड़ी हो
तो लगता है
कोई ऋतु ठहर गई है,
और पेड़ ने
अपने सारे सपने
एक ही डाल पर सजा दिए हों।
हरसिंगार की तरह तुम भी
गिरकर भी महकती हो,
छूकर भी छूट जाती हो,
पर दिल में
हमेशा बनी रहती हो।
मुकेश ,,,,,
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