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Monday, 23 March 2026

तुम… और स्वप्नपरी

 तुम…

और स्वप्नपरी

दोनों ही यक़ीन और वहम के बीच की कोई रेखा हो,

जिसे छूते ही

हक़ीक़त भी हल्की-सी काँप उठे।


तुम्हारी आँखों में

नींद नहीं, एक संसार बसता है,

जहाँ हर ख़्वाब

धीरे-धीरे साँस लेता है।


स्वप्नपरी की तरह तुम—

आती हो बिना आहट,

और लौट जाती हो

दिल में एक उजली धुंध छोड़कर।


मैं जागता हूँ,

पर तुम्हें देखता हुआ

नींद में चला जाता हूँ

क्योंकि तुम हक़ीक़त नहीं,

मेरी रूह का देखा हुआ

सबसे सुंदर ख़्वाब हो।


मुकेश ,,,,,

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