तुम्हारी कॉफ़ी की महक में मेरा इंतज़ार
तुम आई थीं
और मेज़ पर
आधी कॉफ़ी छोड़ गई थीं।
अब भी
उस कप से उठती हल्की महक में
तुम्हारी उँगलियों की गर्मी है।
मैं हर घूँट में
तुम्हारा नाम सुनता हूँ
और लगता है
मेरा इंतज़ार
कॉफ़ी की उसी भाप में
धीरे-धीरे घुल रहा है।
मुकेश ,,,,,
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