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Friday, 20 March 2026

श्वास और शून्य के बीच

 श्वास और शून्य के बीच


श्वास आती है

जैसे कोई पुरानी याद

बिना दस्तक

अंदर उतर आती हो।


श्वास जाती है

जैसे कोई रिश्ता

धीरे-धीरे

अपने ही अर्थ से मुक्त हो रहा हो।


इन दोनों के बीच

एक बेहद महीन-सा ठहराव है,

जहाँ

न जीवन पूरी तरह है,

न मृत्यु पूरी तरह।


बस एक

अलिखित विराम।


मैंने उसी विराम में

तुम्हें ढूँढना चाहा


पर वहाँ “तुम” नहीं थीं,

न ही “मैं” था।


सिर्फ़

एक साक्षी

जो न देख रहा था,

न देखा जा रहा था।


सूफ़ी उसे

फ़ना का दरवाज़ा कहता है


जहाँ

हर पहचान

अपनी ही धूल में

गिर जाती है।


और अद्वैत

उसे ही

ब्रह्म का स्पर्श कहता है


जहाँ

कुछ भी अलग नहीं बचता।


मैं

हर श्वास के साथ

जन्म लेता हूँ,


और

हर निश्वास में

मर जाता हूँ


पर जो

इन दोनों के बीच है


वो न जन्मा,

न मरा।


वही

मेरा असली नाम है


जिसे मैं

कभी बोल नहीं पाया।


अब

मैं श्वास नहीं लेता


श्वास

मुझे लेती है,


और शून्य

मुझे

हर बार

पूरा कर देता है।


श्वास और शून्य के बीच

मैं नहीं,

सिर्फ़ “है” घटित होता है।


मुकेश ,

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