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Friday, 20 March 2026

एक नज़्म उन मर्दों के नाम, जिन्हें उनकी मोहब्बत ने ठुकरा दिया

 एक नज़्म उन मर्दों के नाम, जिन्हें उनकी मोहब्बत ने ठुकरा दिया


वो मर्द…

जिन्हें उनकी मोहब्बत ने ठुकरा दिया,

मगर उन्होंने

मोहब्बत को ठुकराया नहीं।


उन्होंने रोया भी

मगर शोर नहीं किया,

आँखें भीगीं,

पर इज़हार नहीं किया।


वो मर्द…

जो टूटे,

मगर बिखरे नहीं—

जैसे कोई शीशा

अंदर ही अंदर दरक जाए,

और बाहर से

अब भी पूरा दिखाई दे।


उन्होंने

न ज़िन्दगी से मुँह मोड़ा,

न ज़िम्मेदारियों से,

न ही किसी के आगे

मोहब्बत की भीख माँगी।


बस एक अजीब-सी थसक थी उनमें

कि चाहेंगे भी

तो सिर उठाकर,

और ठुकराए जाएँगे भी

तो मुस्कुराकर।


वो मर्द…

जिन्होंने अपने जख़्म

किसी को दिखाए नहीं,

बस कभी-कभी

रात के सन्नाटे में

एक गिलास में

थोड़ी-सी ख़ामोशी घोल ली।


हाँ…

कभी शौक़ में शराब पी ली,

कभी सिगरेट जला ली

मगर ये आदत नहीं थी,

बस एक लम्हे की तसल्ली थी

जिसे वो सुबह होने से पहले

भुला देते थे।


कभी किसी अपने से

इशारों में कुछ कह भी दिया—

मगर आधी बात,

हमेशा आधी ही रही।


उनकी मोहब्बत…

अब भी वैसी ही थी—

बिना शिकवा,

बिना इल्ज़ाम,

बस थोड़ी-सी खामोश

और थोड़ी-सी दूर।


वो मर्द…

जो जानते थे

कि हर चाहत मुकम्मल नहीं होती,

फिर भी उन्होंने

चाहने का सलीक़ा नहीं छोड़ा।


और एक दिन

आईने में खुद को देखकर

हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा—


“ठीक हूँ…”


जैसे ये दो लफ़्ज़

उनकी पूरी दास्तान हों।


(यह नज़्म हर उस मर्द के नाम,

जो ठुकराए जाने के बाद भी

अपनी थसक से जीता रहा।)


— मुकेश इलाहाबादी

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