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Friday, 20 March 2026

मैं जंगल से बातें करता हूँ…

 मैं जंगल से बातें करता हूँ…

क्योंकि लोग सुनते नहीं,

और पेड़ बोलते नहीं

फिर भी सब कह देते हैं।


जब भीतर बहुत शोर होता है,

मैं यहाँ चला आता हूँ,

और अपनी ख़ामोशियाँ

इन पत्तों के हवाले कर देता हूँ।


हवा उन्हें हिलाती है

जैसे कोई जवाब

धीरे से सिर हिला रहा हो।


यहाँ

कोई सवाल नहीं करता,

कोई शक नहीं करता,

बस एक गहरी तन्हाई

मेरे साथ बैठ जाती है।


और तब समझ आता है

मैं जंगल से नहीं,

अपने ही अंदर उगे

एक सच से बातें कर रहा हूँ।


मुकेश ,,,,,,,,,,,


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