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Friday, 20 March 2026

इश्क़ का बेकिनारा दरिया (एक और रंग)

 इश्क़ का बेकिनारा दरिया (एक और रंग)


इश्क़

एक ऐसा दरिया

जिसमें उतरते ही

अपने ही पैरों के निशान

डूब जाते हैं।


कोई किनारा नहीं,

कोई सहारा नहीं,

बस एक बहाव है

जो नाम लेकर नहीं,

रूह लेकर चलता है।


मैंने सोचा था

तैर लूँगा आसानी से,

पर ये पानी

हिसाब नहीं रखता

ये तो बस

डूबना सिखाता है।


अजीब है ये दरिया

जितना डूबो,

उतना हल्का कर देता है,

जितना खोओ,

उतना पा लेते हो।


और फिर एक पल आता है

जब समझ में आता है,

कि किनारे की तलाश ही

सबसे बड़ी दूरी थी…


क्योंकि इश्क़ में

मंज़िल नहीं होती,

सिर्फ़

बेकिनारा होना होता है।


मुकेश ,,,,,,,,

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