इश्क़ का बेकिनारा दरिया
इश्क़
एक दरिया है
जिसका कोई किनारा नहीं,
बस गहराई है
जो हर क़दम पर
और गहरी होती जाती है।
मैं उतरा था
बस पाँव भिगोने,
पर ये पानी
रूह तक उतर गया—
और अब लौटना
मुमकिन नहीं।
लहरें
कभी सहलाती हैं,
कभी डुबो देती हैं
पर हर डूब में भी
एक अजीब-सी राहत है।
यहाँ
कोई दिशा नहीं,
कोई मंज़िल नहीं,
सिर्फ़ बहना है
अपने ही वजूद से
दूर,
और शायद
किसी और के क़रीब।
इश्क़ का ये दरिया
डराता भी है,
बुलाता भी
और जो एक बार उतरे,
वो फिर
किनारे की ख़्वाहिश
भूल जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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