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Friday, 20 March 2026

सन्नाटे के शहर में जलता हुआ दिल

 सन्नाटे के शहर में जलता हुआ दिल


एक शहर है—

जहाँ शोर नहीं,

बस सन्नाटा दीवारों से टकराकर

वापस लौट आता है।


गलियाँ ख़ाली हैं,

दरवाज़े बंद,

और खिड़कियों में

कोई चेहरा नहीं ठहरता।


पर इसी वीराने में

एक दिल है

जो अब भी

चुपचाप जल रहा है।


न धुआँ उठता है,

न कोई चीख़,

बस एक धीमी-सी आँच

जो हर साँस के साथ

और गहरी हो जाती है।


अजीब है

इतनी ख़ामोशी के बीच भी

ये दिल

इतना बेचैन कैसे है?


शायद इसलिए

कि सन्नाटा

आवाज़ों को नहीं,

अंदर के शोर को

और साफ़ कर देता है।


और तब समझ में आता है

कि इस शहर में

सब कुछ बुझा हुआ नहीं है…


कहीं न कहीं

एक दिल अब भी

जल रहा है

और वही

इस सन्नाटे को

ज़िंदा रखे हुए है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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