चलो किसी वीरान एहसास की गली में
चलो
किसी वीरान एहसास की गली में,
जहाँ यादें
दीवारों से टिककर
धीरे-धीरे साँस लेती हैं।
जहाँ कदमों की आहट
खुद से टकराकर
लौट आती है,
और सन्नाटा
हमसे कुछ कहने की कोशिश करता है।
चलो वहाँ
जहाँ रोशनी भी
थोड़ी थकी हुई लगे,
और धूप
ज़मीन पर बैठकर
ख़ामोश हो गई हो।
हम कुछ नहीं कहेंगे,
बस साथ चलेंगे—
तुम मेरे पास,
और मैं तुम्हारे करीब,
जैसे दो अधूरे ख़याल
एक ही खामोशी में
पूरा होना चाहते हों।
उस गली के मोड़ पर
शायद कोई पुराना पल
हमारा इंतज़ार कर रहा हो,
या कोई भूला हुआ एहसास
फिर से नाम लेकर पुकार दे।
अगर कुछ भी न मिला,
तो भी क्या—
कम से कम
हम उस वीराने में
अपने होने की आहट
तो सुन पाएँगे।
चलो
किसी वीरान एहसास की गली में,
जहाँ खोना भी
एक तरह से
मिल जाना होता है।
मुकेश ,,
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