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Wednesday, 25 March 2026

धूल से ढकी हुई आईने की सच्चाई

 धूल से ढकी हुई आईने की सच्चाई


धूल से ढका हुआ आईना

कुछ छुपाता नहीं

बस

दिखाना थोड़ा टाल देता है।


उसकी सतह पर जमी परतें

वक़्त की नहीं,

नज़र की होती हैं—

हम जितना बचते हैं,

उतनी धूल जमती जाती है।


आईना

कभी झूठ नहीं बोलता,

पर हम

उसे देखने से पहले ही

अपने सच गढ़ लेते हैं।


कभी उँगली फेरो उस पर,

एक लकीर साफ़ हो जाती है

जैसे भीतर

किसी स्वीकार की शुरुआत।


मनोविज्ञान कहता है

हम खुद को

वैसा नहीं देखते जैसे हैं,

वैसा देखते हैं

जितना सह सकते हैं।


इसलिए

आईना ढक जाता है,

और हम

सुकून समझ लेते हैं।


मगर सच्चाई—

वो वहीं रहती है,

धूल के नीचे,

बिना हिले…


बस इंतज़ार में

कि कोई

एक बार

पूरी तरह

उसे साफ़ कर दे…


और फिर—

जो दिखेगा,

वो चेहरा नहीं होगा,

बल्कि

खुद से मिलने का

पहला लम्हा होगा…।


मुकेश ,,,,,

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