फटी जेब में रखे अधूरे ख़्वाब
फटी जेब में रखे अधूरे ख़्वाब
अक्सर गिर जाते हैं रास्तों में
बिना शोर के,
बिना किसी को बताए।
उन्हें उठाने वाला कोई नहीं होता,
बस धूल
उन्हें धीरे-धीरे
अपना बना लेती है।
ये ख़्वाब
नए नहीं होते,
पर पूरी तरह पुराने भी नहीं
बीच में अटके रहते हैं,
जैसे ज़िन्दगी
किसी मोड़ पर रुक गई हो।
फटी जेब
सिर्फ़ कपड़े की नहीं होती,
वो हालात की भी होती है—
जहाँ चाहतें
सिलाई से पहले ही
उधड़ने लगती हैं।
कभी-कभी
हाथ जेब में जाता है,
और कुछ भी नहीं मिलता
सिवाय उस एहसास के
कि कुछ था…
जो अब नहीं है।
फिर भी
इंसान
उसी फटी जेब में
नए ख़्वाब रखता है,
क्योंकि उसे मालूम है
ख़्वाब गिरते हैं,
टूटते नहीं…
और ज़िन्दगी
उन्हीं गिरे हुए ख़्वाबों को
फिर से उठाने की
एक जिद है…।
मुकेश ,,,
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