तुम और अस्तित्व का प्रश्न
बहुत समय तक
मैं अस्तित्व के प्रश्न से जूझता रहा
क्यों है यह जगत?
क्यों है यह जीवन?
और इस सबके बीच
मैं स्वयं क्यों हूँ?
दर्शन की पुस्तकों में
उत्तर खोजे,
तर्क के जंगलों में
रास्ते तलाशे।
कभी लगा
अस्तित्व केवल संयोग है,
कभी लगा
यह किसी गहरे रहस्य की छाया है।
पर एक दिन
जब तुम सामने आईं,
तो लगा—
प्रश्न ने अचानक
अपना स्वर बदल लिया है।
अब यह नहीं था कि
“क्यों है यह जगत?”
अब प्रश्न था—
“क्यों तुम्हारी उपस्थिति से
यह जगत
इतना अर्थपूर्ण हो जाता है?”
तुम्हारी हँसी
जैसे अस्तित्व का प्रमाण थी,
तुम्हारी आँखें
जैसे किसी गूढ़ सूत्र का संकेत।
तब समझ आया—
अस्तित्व केवल होना नहीं है,
किसी के लिए होना भी है।
तुम्हारे होने से
मेरे होने का अर्थ
थोड़ा और स्पष्ट हो गया।
जैसे किसी कठिन प्रश्न के बाद
अचानक मिल जाए
एक सरल-सा उत्तर।
अब भी
अस्तित्व का रहस्य पूरा नहीं खुला,
पर इतना ज़रूर समझ में आया है
कि इस विशाल ब्रह्मांड में
जहाँ अनगिनत तारे जलते हैं,
वहाँ
तुम्हारा होना
मेरे लिए
सबसे गहरा
दार्शनिक उत्तर है।
मुकेश ,,,,,,,
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