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Thursday, 5 March 2026

प्रेम : एक अनुत्तरित प्रमेय

 प्रेम : एक अनुत्तरित प्रमेय


बहुत बार

मैंने प्रेम को

एक गणितीय प्रमेय की तरह

समझने की कोशिश की।


मानो

यदि कुछ शर्तें पूरी हों—

तो निष्कर्ष

अपने आप निकल आएगा।


मैंने कारण जोड़े,

परिस्थितियाँ गिनीं,

समय और स्मृति को

समीकरण में रखा।


पर हर बार

जब परिणाम लिखने लगा,

अंकों की जगह

तुम्हारी धड़कन उतर आई।


तब लगा

प्रेम

किसी कक्षा का प्रश्न नहीं है,

जिसका हल

पुस्तक के अंत में लिखा हो।


वह तो

एक ऐसा प्रमेय है

जिसे हर हृदय

अपने तरीके से सिद्ध करता है,


और फिर भी

पूरी तरह सिद्ध

कभी नहीं हो पाता।


क्योंकि

कभी दूरी

समीकरण बिगाड़ देती है,

कभी एक मुस्कान

सारी गणना बदल देती है।


तुम्हारी आँखों में

मैंने कई बार

उस प्रमेय का संकेत देखा है

जैसे कोई सूत्र

बस बनने ही वाला हो।


पर हर बार

अंतिम पंक्ति से पहले

मन ठहर जाता है।


शायद इसलिए

प्रेम इतना सुंदर है—

क्योंकि वह

पूरी तरह हल नहीं होता।


वह बस

जीवन की कॉपी में

बार-बार लिखा जाता है,


और हर बार

उसके आगे

एक छोटा-सा चिन्ह बनता है


कि यह प्रश्न

अब भी

अनुत्तरित है।


मुकेश ,,,,,,,,

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