तुम्हारी उँगलियों की गरमी
उस दिन
जब तुमने
किसी बात पर हँसते हुए
मेरी हथेली को
हल्का-सा छुआ था,
तुम्हारी उँगलियों की गरमी
देर तक
मेरी त्वचा पर ठहरी रही।
जैसे सर्द सुबह में
पहली धूप
धीरे-धीरे
किसी खिड़की पर उतरती है।
तुम तो
कुछ ही पलों में
अपना हाथ खींच कर
दूसरी ओर देखने लगी थीं,
पर मेरी हथेली में
अब भी
तुम्हारी उँगलियों की गरमी
एक छोटी-सी
मोहब्बत बनकर
धड़क रही है।
मुकेश ,,,
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