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Tuesday, 17 March 2026

तुम्हारे स्पर्श की हवा

 तुम्हारे स्पर्श की हवा

तुम पास से गुज़री थीं

बस उतनी-सी देर के लिए

जितनी देर

हवा को एक मोड़ लेने में लगती है।


पर उस हल्की-सी हवा में

तुम्हारे स्पर्श की नरमी थी—

जैसे किसी ने

मेरे कंधे पर

धीरे से हाथ रख दिया हो।


अब तुम दूर हो,

मगर कभी-कभी

कोई हवा का झोंका आता है

और मुझे लगता है

तुम फिर से

मेरे बहुत क़रीब से गुज़र गई हो।


मुकेश ,,,,,

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