तुम्हारे स्पर्श की हवा
तुम पास से गुज़री थीं
बस उतनी-सी देर के लिए
जितनी देर
हवा को एक मोड़ लेने में लगती है।
पर उस हल्की-सी हवा में
तुम्हारे स्पर्श की नरमी थी—
जैसे किसी ने
मेरे कंधे पर
धीरे से हाथ रख दिया हो।
अब तुम दूर हो,
मगर कभी-कभी
कोई हवा का झोंका आता है
और मुझे लगता है
तुम फिर से
मेरे बहुत क़रीब से गुज़र गई हो।
मुकेश ,,,,,
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