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Friday, 27 March 2026

बारिश, चाय और एक अनकहा रिश्ता

 बारिश, चाय और एक अनकहा रिश्ता


बारिश हो रही थी

धीरे-धीरे,

जैसे आसमान

अपने ही ख़्यालों में भीग रहा हो।


खिड़की के शीशे पर

बूँदें दस्तक दे रही थीं,

और अंदर

चाय की भाप

ख़ामोशी को गर्म कर रही थी।


मैं बैठा था

एक अधूरी सी शाम के साथ,

हाथ में चाय का प्याला,

और दिल में

तुम्हारा एक नाम…

जो आज भी

लफ़्ज़ नहीं बन पाया।


तुम सामने थीं

या शायद नहीं भी,

क्योंकि तुम्हारी मौजूदगी

हमेशा इस तरह होती है

दिखती कम,

महसूस ज़्यादा।


बारिश की हर बूँद

जैसे कुछ कहती थी,

और हम

उसे सुनने की कोशिश में

और भी ख़ामोश हो जाते थे।


चाय ठंडी हो रही थी,

मगर हमारी उंगलियाँ

अब भी उसके किनारों को थामे थीं,

जैसे उस गर्मी में

कोई रिश्ता तलाश रही हों।


वो रिश्ता

जिसका कोई नाम नहीं,

कोई इज़हार नहीं,

बस एक एहसास है…

जो हर बार

बिना बोले ही

सब कुछ कह जाता है।


तुमने कुछ कहा नहीं,

मैंने भी कुछ पूछा नहीं

मगर उस खामोशी में

इतनी बातें थीं

कि अगर लफ़्ज़ होते

तो शायद

रिश्ता टूट जाता।


बारिश तेज़ हो गई थी,

जैसे आसमान

अपना दिल हल्का कर रहा हो,

और हम

अपनी-अपनी चुप्पियों में

भरे हुए थे।


तुम्हारी आँखों में

कुछ था

शायद एक सवाल,

या शायद एक जवाब,

जो दोनों ही

बयान होने से डर रहे थे।


मैंने चाय का आख़िरी घूँट लिया,

और उस गर्मी में

तुम्हारी नज़दीकी महसूस की

जैसे कोई एहसास

हाथों से होकर

सीधे दिल तक पहुँच गया हो।


बारिश, चाय…

और ये अनकहा रिश्ता


तीनों में

एक अजीब सी समानता थी,

तीनों ही

लम्हों के लिए आते हैं,

मगर अपने पीछे

एक गहरी याद छोड़ जाते हैं।


तुम उठीं

जैसे कोई ख़्वाब

धीरे-धीरे आँखों से उतरता है,

और मैं…

उसी कुर्सी पर बैठा रहा,

हाथ में खाली प्याला,

और दिल में

वही भरी हुई खामोशी।


बारिश रुक गई थी,

मगर उसकी महक

अब भी हवा में थी


जैसे तुम चली गई हो,

मगर तुम्हारा एहसास

अब भी यहीं कहीं ठहरा हो।


और मैं समझ गया


कि कुछ रिश्ते

बनते नहीं,

कहे नहीं जाते,

बस…


बारिश की तरह आते हैं,

चाय की तरह ठहरते हैं,

और यादों की तरह

हमेशा के लिए

दिल में बस जाते हैं।


मुकेश ,,,,,,

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