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Friday, 27 March 2026

तुम थे या बस एहसास की कोई चाल थी

 तुम थे या बस एहसास की कोई चाल थी


तुम थे

या बस एहसास की कोई चाल थी,

जो दिल ने खुद ही चली

और फिर

खुद ही उसमें उलझता रहा?


कभी लगता है

तुम सच में थे

किसी सुबह की नर्म धूप की तरह,

जो बिना आवाज़ के

आँगन में उतर आती है,


और कभी…

यक़ीन नहीं होता

कि तुम कभी थे भी।


तुम्हारी याद

कोई साफ़ तस्वीर नहीं,

एक धुंधला सा अहसास है—

जैसे आईने पर जमी भाप

जिसमें चेहरा दिखता तो है,

मगर पहचान में नहीं आता।


तुम थे

या बस मेरी तन्हाई

ने तुम्हारा ख़्याल गढ़ लिया था,

जैसे कोई बच्चा

अँधेरे में

अपने ही साए से खेलता है।


मैंने तुम्हें

हर उस लम्हे में ढूँढा

जहाँ दिल थोड़ा ज़्यादा धड़कता था,

हर उस खामोशी में

जहाँ आवाज़ होने की गुंजाइश थी।


मगर तुम

हर बार

थोड़ा और धुँधले हो जाते,

थोड़ा और दूर।


तुम्हारी हँसी…

क्या सच में सुनी थी मैंने,

या वो भी

मेरे ख़्याल की कोई गूँज थी?


तुम्हारी आँखें…

क्या सच में मिली थीं मेरी आँखों से,

या वो भी

एक ख़्वाब की परत थी

जो जागते ही उतर गई?


तुम थे—

या बस एहसास की कोई चाल थी,

जो दिल ने

अपने ही ख़िलाफ़ चली?


कभी-कभी

मैं खुद से पूछता हूँ

अगर तुम सच में थे,

तो अब क्यों नहीं हो?


और अगर तुम कभी थे ही नहीं—

तो फिर

ये दर्द कहाँ से आया?


ये जो सीने में

एक खाली जगह है,

जो हर साँस के साथ

भरती भी है,

और खाली भी रहती है


ये किसकी निशानी है?


तुम थे

या बस एक लम्हा,

जो गुज़रते हुए

अपने होने का यक़ीन दिला गया,

और जाते हुए

सब कुछ साथ ले गया।


शायद तुम

कोई शख़्स नहीं थे,

बस एक एहसास थे—

जो मेरे अंदर ही पैदा हुआ,

और मेरे अंदर ही खो गया।


या शायद…

तुम सच में थे,

मगर वक़्त ने

तुम्हें इतनी सफ़ाई से मिटाया

कि अब

बस तुम्हारा एहसास रह गया है।


तुम थे

या बस एहसास की कोई चाल थी…


इस सवाल का जवाब

शायद कभी नहीं मिलेगा,

क्योंकि कुछ सच

पूरे नहीं होते


और कुछ झूठ

इतने ख़ूबसूरत होते हैं

कि दिल उन्हें

सच मान लेना चाहता है।


और मैं…

अब भी वहीं खड़ा हूँ,

उसी सवाल के साथ—


तुम थे…

या बस

मेरी रूह की

एक ख़ामोश चाल थी?


मुकेश ,,,,

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