दीवार पर फिसलती चाँदनी
दीवार पर फिसलती चाँदनी
कुछ कहे बिना
कमरे में फैल जाती है,
जैसे रात
किसी की याद
आहिस्ता से
छोड़ गई हो।
हवा
परदे को छूती है,
और दिल
किसी पुराने नाम पर
ठहर जाता है।
न नींद पूरी है,
न ख़याल अधूरा—
बस
इस उजाले में
थोड़ी-सी
मोहब्बत
जागती रहती है।
और चाँदनी
बिना ठहरे
आगे बढ़ जाती है,
जैसे
हर ख़ूबसूरत चीज़
रुकने का वादा
नहीं करती।
मुकेश्,,,
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