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Monday, 2 March 2026

दीवार पर फिसलती चाँदनी

 दीवार पर फिसलती चाँदनी

दीवार पर फिसलती चाँदनी

कुछ कहे बिना

कमरे में फैल जाती है,

जैसे रात

किसी की याद

आहिस्ता से

छोड़ गई हो।

हवा

परदे को छूती है,

और दिल

किसी पुराने नाम पर

ठहर जाता है।

न नींद पूरी है,

न ख़याल अधूरा—

बस

इस उजाले में

थोड़ी-सी

मोहब्बत

जागती रहती है।

और चाँदनी

बिना ठहरे

आगे बढ़ जाती है,

जैसे

हर ख़ूबसूरत चीज़

रुकने का वादा

नहीं करती।

मुकेश्,,, 

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