रुक गया एक क़दम और
जब तुम मुड़े थे जाने को,
मैंने पुकारा नहीं —
बस इतना सोचा
कि रुक गया एक क़दम और।
हाथ बढ़ाया था मैंने,
पर हवा को ही छू सका,
तुम्हारी उँगलियों तक पहुँचने से पहले
रुक गया एक क़दम और।
बहुत कुछ कहना था —
कि तुम मेरे दिनों की आदत हो,
मेरी रातों की धीमी रौशनी,
पर होंठों से पहले ही
रुक गया एक क़दम और।
तुमने आँख उठाकर देखा भी था,
जैसे इंतज़ार हो एक इशारे का,
मैंने धड़कनों को समझाया बहुत,
मगर दिल से बाहर आने से पहले
रुक गया एक क़दम और।
अब जब यादों की पगडंडी पर चलता हूँ,
हर मोड़ पे वही ठहराव मिलता है —
प्रेम पूरा था शायद,
बस उसे जीने में
रुक गया एक क़दम और।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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