“मैं ख़ामोशी लिखता हूँ,
तुम उसे अर्थ दे देती हो…”
मेरे पास शब्द नहीं होते
सिर्फ़ ठहराव होता है,
एक अधूरा सा कंपन,
जो किसी नाम की तलाश में भटकता है।
और तुम…
बिना कुछ कहे,
उस भटकन को दिशा दे देती हो,
जैसे हवा
बिन दिखे भी
दीपक की लौ को समझा देती है
कि उसे किस ओर झुकना है।
मैं जो चुप रहता हूँ,
वो भी एक भाषा है—
पर अधूरी,
जब तक तुम
उसे अपने स्पर्श से
पूरा न कर दो।
तुम्हारे होने से
मेरी हर खामोशी
कहानी बन जाती है,
और मैं
बस एक लेखक नहीं,
तुम्हारी उपस्थिति का
साक्षी बन जाता हूँ।
शायद इसी लिए
मैं लिखता नहीं,
तुमसे लिखवाता हूँ…
क्योंकि अर्थ हमेशा
शब्दों में नहीं,
किसी ‘तुम’ में छुपा होता है।
मुकेश ,
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