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Sunday, 29 March 2026

तुम वह मौन हो, जिसमें मेरा हर शब्द जन्म लेता है…

 तुम वह मौन हो,

जिसमें मेरा हर शब्द जन्म लेता है…”


तुम

सिर्फ़ खामोशी नहीं,

वो गर्भ हो

जहाँ अर्थ पलते हैं।


मैं जो भी कहता हूँ,

वो पहले तुम्हारे भीतर

अनकहा ठहरता है,

फिर लफ़्ज़ बनकर

मेरी ज़ुबान तक आता है।


तुम्हारे बिना

मेरे शब्द अधूरे नहीं

निर्जीव हैं,

जैसे धड़कन बिना स्वर के।


तुम वह शून्य हो,

जिसमें मेरी सारी आवाज़ें

अपना आकार पाती हैं।


और मैं…

बस एक माध्यम हूँ,

जिससे होकर

तुम्हारी निस्तब्धता

स्वर बन जाती है।


शायद इसी लिए—

मैं तुम्हें सुनता नहीं,

तुममें खुद को सुनता हूँ।


मुकेश ,,,,,

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