तुमसे मिलकर जाना—
प्रेम भी एक दर्पण है…”
तुमसे मिलना
किसी और को पाना नहीं था,
बल्कि खुद से पहली बार
सच में मिलना था।
तुम्हारी आँखों में
जो चमकती थी—
वो तुम्हारी नहीं,
मेरी ही कोई अधूरी पहचान थी।
तुम्हारी मुस्कान में
जो सुकून था,
वो मेरे भीतर छुपे
अधूरे उत्तरों की गूँज थी।
मैंने तुम्हें चाहा—
और जाना कि
मैं खुद को ही पुकार रहा था
किसी और के नाम से।
प्रेम ने मुझे तुम तक नहीं,
मुझ तक पहुँचा दिया।
और तब समझ आया—
दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता,
वो बस वही दिखाता है
जो हम देखने से डरते हैं।
तुमसे मिलकर जाना—
प्रेम कोई रिश्ता नहीं,
एक उद्घाटन है…
जहाँ परदे हटते हैं,
और आत्मा
अपने ही सत्य से
नज़रें मिलाती है।
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