तुम और मैं
दो नहीं,
एक ही अनुभूति के दो भ्रम हैं।”
तुम
जैसे श्वास का पहला स्पर्श,
और मैं
उसका अनसुना कंपन।
हम अलग कहाँ हैं…
बस दृष्टि का एक धोखा है,
जहाँ आत्मा
अपने ही प्रतिबिंब को
‘तुम’ कहकर पुकारती है।
जब तुम पास होती हो,
तो कोई दूरी नहीं मिटती—
क्योंकि कभी थी ही नहीं।
और जब तुम दूर जाती हो,
तो कुछ खोता भी नहीं—
क्योंकि जो सत्य है,
वह न मिलने से बनता है,
न बिछड़ने से टूटता है।
तुम और मैं
दो किनारे नहीं,
एक ही सागर की
अलग-अलग लहरों का अहसास हैं।
और शायद…
प्रेम वही क्षण है,
जब यह भ्रम टूटता है—
और हम याद करते हैं,
कि हम कभी
अलग थे ही नहीं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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